ईवीएम क्या होता है ?

ईवीएम क्या होता है ?

ईवीएम क्या होता है ?

ईवीएम का फुल्लफॉर्म इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन होता है.ईवीएम का इस्तेमाल चुनाव में बैलेट पेपर की जगह किया जाता है.

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की संरचना

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में मुख्य रूप से दो मशीन शामिल होती है.एक कंट्रोलर और दूसरी मशीन है बैलट. बैलेट मशीन पर चुनाव में खड़े उमीदवारों का नाम,उनका राजनितिक पक्ष,उनका चुनाव चिन्ह और नोटा का चिन्ह होता है.हर उम्मीदवार नाम के आगे एक बटन होता है. इस बटन को दबाकर मतदाता अपना मत दर्ज करता है.
वोटर के बटन दबाते ही उसका वोट डिजिटल रूप से कंट्रोलर में जमा हो जाता है. यह कंट्रोलर बिजली के केबल से जुड़ा होता है. जिससे कंट्रोलर को ऊर्जा मिलती है. बैलेट और कंट्रोलर आपस में एक लंबी केबल से जुड़े होते.भारतीय निर्वाचन आयोग आनेवाले चुनावों में वीवीपीएटी VVPAT का इस्तेमाल करने वाला है. जिसकी मदत से वोटर अपने वोट की पुष्टी कर सकता है.

भारत में ईवीएम की शुरुआत कब और कैसे हुई थी?

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल भारत में पहली बार 1982 में केरल विधानसभा उपचुनाव के दौरान हुआ था.केरला के उत्तरी परावुर में ईवीएम मशीन का पहली बार इस्तेमाल हुआ. तब सिर्फ 50 पोलिंग स्टेशन में एक प्रयोग के तौर पर इनका इस्तेमाल हुआ था. लेकिन यह चुनाव विवादों में आ गया था.तब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की उपयोगिता पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मतदान को खारिज कर दिया था और इन 50 पोलिंग स्टेशन पर दोबारा बैलेट पेपर से वोटिंग करवाने का आदेश दिया था.

ईवीएम क्या है
ईवीएम मशीन को बूथ पर ले जाती हुयी कर्मचारी

सुप्रीम कोर्ट ने तब यह कहा था कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर पहले स्पष्ट कानून बने बाद में इसका इस्तेमाल हो. इसके बाद साल 1988 में संसद में रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट 1951 में संशोधन कर ईवीएम के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी गई.

साल 1998 के चुनाव में एक प्रयोग के तौर पर 16 विधानसभा सीटों पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल किया गया था और यह चुनाव कारगिर साबित हुआ.बादमे मध्यप्रदेश, राजस्थान में 55 सीटों पर और दिल्ली में 6 सीटों पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का प्रयोग सफल साबित हुआ था.इसके बाद साल 2008 में तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में सभी सीटों पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का प्रयोग हुआ.साल 2004 के लोकसभा चुनाव में पहली बार पूरे देश में ईवीएम के जरिए चुनाव करवाया गया.इसके बाद से सारे चुनाव ईवीएम के जरिए ही होते आ रहे है.

ईवीएम का दुनिया में इस्तेमाल

अबतक दुनियाभर में 31 देशो ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन मशीन का प्रयोग किया है. जिनमेसे 4 देश आज भी ईवीएम का इस्तेमाल देश के हर चुनाव के लिए करते है. वही दुनिया में 11 देश ऐसे है,जो जरुरत के वक़्त ईवीएम मशीन का चुनाव करते है. और बाकि के देशो ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का प्रायोगिक तौर पर ईवीएम का इस्तेमाल किया लेकिन बादमे किन्ही कारणों की वजह इसका इस्तेमाल बंद हुआ.

अमेरिका के ज्यादातर राज्यों चुनाव इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के जरिए होते है.साथ ही ईवीएम के साथ वीवीपीएटी का होना भी अनिवार्य है. ब्राजील में साल 1996 से वोटिंग ईवीएम से ही होती है.वेनेजुएला में वोटिंग ईवीएम मशीन द्वारा कियी जाती है.

दुनिया में बहुत से ऐसे देश भी हैं जो ईवीएम से चुनाव करवाने के बाद दोबारा बैलेंस चुनाव करवाने लगे या नहीं उन्होंने पहले ईवीएम को आजमाया और उसके बाद वह वापस बैलेट पेपर पर आ गए.उदाहरण के तौर पर निदरलैंड-

नीदरलैंड्स ने 1990 से 2007 के दौरान अपने चुनाव मैं इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल किया. लेकिन उसके बाद वह फिर बैलेट से चुनाव करवाने लगा.ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यहां की सिर्फ एक प्राइवेट कंपनी ही यह सारी ईवीएम बनाती थी और सरकार को उस पर कंपनी पर भरोसा नहीं था. इसलिए सरकार ने ईवीएम से चुनाव करवाने बंद कर दिए.

जर्मनी की एक संवैधानिक अदालत ने वोटिंग में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी.

जनसँख्या कम होने की वजह से या शायद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर विश्वास न होने की वजह से इंग्लैंड में कभी भी ईवीएम का इस्तेमाल नहीं किया है.

फ्रांस में 2007 के राष्ट्रपति प्राथमिक चुनावो के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल किया. लेकिन फ्रांस के लोगो को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग से ज्यादा इंटरनेट वोटिंग ज्यादा पसंद आयी और उन्होंने ईवीएम का इस्तेमाल बंद किया.

इटली में 2006 के नेशनल इलेक्शन के दौरान नेडॉप् वोटिंग मशीन का इस्तेमाल प्रायोगिक तौर पर किया.इस चुनाव में 4 पोलिंग बूथ पर 3000 मतदाताओं ने अपना वोट डाला और यह प्रयोग सफल रहा.लेकिन इस्तेमाल के लिए महँगा होने की वजह से इटली सरकार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल करना बंद कर दिया.

ईवीएम की सुरक्षा कैसे होती है?

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का निर्माण बेहद गोपनीय तरीके से होता है.मशीन निर्माण के दौरान किसी को यह पता नहीं होता कि, बैलेट यूनिट पर किस पार्टी के उम्मीदवार को कौन से नंबर पर यानी कहां जगह मिलेगी. जब उम्मीदवारों की सूची फाइनल हो जाती है तभी बैलेट पर प्रत्याशियों के नाम सामने आते हैं.

चुनाव के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को एक स्ट्रांग रूम में रखा जाता है. इस रुम में जाने की अनुमति केवल चुनाव आयोग के कर्मचारियों और पुलिस कर्मचारियों के लिए होती है.

चुनाव के दौरान पहले चरण में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की जांच इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के इंजीनियर करते है. इस प्रक्रिया में किसी और को शामिल नहीं किया जाता. किसी भी चुनाव में इन मशीनों को किसी खास क्रमांक में नहीं भेजा जाता. कोई भी मशीन किसी भी बूथ पर भेजी जा सकती है.

ईवीएम क्या है
मॉक पोलिंग करवाते हुए कर्मचारी

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लगाने का काम उम्मीदवारों या उनके पोलिंग एजेंट की निगरानी होता है. ताकि बाद में किसी को कोई शक ना हो ईवीएम में कुछ गड़बड़ी हुयी है.ईवीएम की कंट्रोल यूनिट और बैलेट यूनिट का एक यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर होता है. यह यूआईडी उम्मीदवारों को भी दिया जाता है.किसी भी बूथ पर वोटिंग शुरू होने से पहले प्रि-साइडिंग ऑफिसर एक मॉक पोल करवाता है.यह मॉक पोलिंग सभी उम्मीदवारों या उनके एजेंट के सामने की जाती है. ताकि सभी को यह यकीन हो जाए कि मशीनें ठीक-ठाक काम कर रही है.

वोटिंग के बाद ईवीएम की सुरक्षा कैसे होती है?

ईवीएम क्या है
स्ट्रांग रूम में रखे हुए ईवीएम मशीन

वोटिंग खत्म होने के बाद इन मशीनों को उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंट के सामने ही सील किया जाता है.पोलिंग एजेंट चाहे तो मशीनों पर अपने हस्ताक्षर भी कर सकते हैं.

इसके बाद पोलिंग पार्टी मशीनों को एक निश्चित स्थान पर ले जाती है .इस दौरान उम्मीदवार या उनके प्रतिनिधि अगर चाहे तो मशीनों को के पीछे पीछे जा सकते हैं और अपनी निगरानी में यह सब कुछ करवा सकते हैं.

इसके बाद रिटर्निंग ऑफिसर इन मशीनों को स्ट्रांग रूम में रख देता है.उम्मीदवार चाहे तो स्ट्रांग रूम के ताले पर अपनी अपनी मोहर भी लगा सकते हैं. उम्मीदवार और उनके प्रतिनिधि चाहे तो चौबीसों घंटे स्ट्रांग रूम पर नजर रख सकते हैं ,उसके बाहर खड़े रह सकते हैं.

वोटों की गिनती वाले दिन स्ट्रांग रूम की ताले की सील उम्मीदवारों और उनके प्रतिनिधियों के सामने ही तोड़ी जाती है. हर मतदान केंद्र में एक रजिस्टर्ड होता है. जिसमें मतदाताओं की डिटेल्स होते हैं.पोलिंग एजेंट और उम्मीदवार इन डिटेल्स का मिलान ईवीएम में डाले गए वोटोंसे कर सकते हैं.कुल मिलाकर बताया जाए तो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन एक मजबूत वोटिंग व्यवस्था है. जिसमें छेड़छाड़ लगभग नामुमकिन है.

क्या ईवीएम को हैक किया जा सकता है ?

बार बार सवाल उठता है की क्या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को हैक किया जा सकता है? शायद इस सवाल का जवाब है फ़िलहाल नहीं?

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में दो ऐसी विशेष बातें होती हैं जिसकी वजह से इसे हैक करना मुमकिन नहीं है.ईवीएम किसी भी दूसरी मशीन से कनेक्ट नहीं होती है या इंटरनेट से जुड़ी हुई नहीं होती है.यानी हर मशीन एक अलग स्टैंडअलोन यूनिट की तरह काम करती है.कोई दो मशीन आपस में कनेक्टेड नहीं होती. इसलिए इलेक्ट्रॉनिक तरीके से इसे हैक नहीं किया जा सकता.

दूसरी बात यह है की,इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में ऐसी कोई सुविधा नहीं होती जिसकी मदद से उसे ब्लूटूथ या वाईफाई से कनेक्ट किया जा सके.और धोकाधडी कर सके.अब भारतीय निर्वाचन आयोग ईवीएम मशीन को वीवीपीएटी (VVPAT) से जोड़ने जा रही है. इसकी वजह से ईवीएम में गड़बड़ी का संभ्रम नही रहेगा.

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