उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा क्या है?

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा का श्रवण किया जाता है.हेमंत ऋतु के मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की एकादशी से इस व्रत का आरंभ होता है.इस व्रत के पालन से हर मनोकामना पूर्ण होती है.

उत्पन्ना एकादशी के एक दीन बाद गौण तथा वैष्णव एकादशी को मनाया जाता है.इस बार उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा का श्रवण 22 नवंबर 2019 को शुक्रवार के करना चाहिए.

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा की शुरुआत

अर्जुन ने कहा- “हे वासुदेव!मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष एकादशी व्रत की क्या महिमा है? इस व्रत को करने से कौन-सा पुण्य मिलता है?इसकी विधि क्या है?कृपा करके यह सब आप विस्तारपूर्वक कहिये.”

श्रीकृष्ण बोले- “हे पार्थ!मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहते है.अब में तुम्हे उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा सुनाता हु, इसे श्राद्धपूर्वक श्रवण करो.

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य हुआ था, उसका नाम मुर था.उस दैत्य ने इन्द्र आदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर उन्हें उनके पद से हटा दिया.तब इन्द्र ने भगवान शंकर से प्रार्थना की-

“हे भोलेनाथ! हम सब देवता, मुर दैत्य के अत्याचारों से दुखी होकर मृत्युलोक में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं.राक्षसों के भय से हम बहुत दुख और कष्ट भोग रहे हैं.मैं स्वयं बहुत दुखी और भयभीत हूँ, अन्य देवताओं की तो बात ही क्या है,अतः हे कैलाशपति! कृपा कर आप मुर दैत्य के अत्याचार से बचने का उपाय बतलाइये.”

देवराज की प्रार्थना सुन शंकरजी ने कहा- “हे देवेन्द्र! आप भगवान श्रीहरि के पास जाइए.मधु-कैटभ का संहार करने वाले भगवान विष्णु देवताओंको अवश्य ही इस भय से मुक्त करेंगे.”

महादेवजी के आदेशानुसार इन्द्र तथा अन्य देवता क्षीर सागर गए,जहाँ पर भगवान श्रीहरि शेष-शैया पर विराजमान थे.इन्द्र सहित सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष उपस्थित होकर उनकी स्तुति की-

“हे तीनों लोकों के स्वामी! आप स्तुति करने योग्य हैं, हम सभी देवताओं का आपको कोटि-कोटि प्रणाम है.हे दैत्यों के संहारक! हम आपकी शरण में हैं, आप हमारी रक्षा करें.हे त्रिलोकपति! हम सभी देवता दैत्यों के अत्याचारों से भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं.इस समय दैत्यों ने हमें स्वर्ग से निकाल दिया है और हम सभी देवता बड़ी ही दयनीय स्थिति में मृत्युलोक में विचरण कर रहे हैं.अब आप ही हमारे रक्षक हैं! रक्षा कीजिये.हे जगन्नाथ! हमारी रक्षा करें.”

देवताओं की करुण पुकार सुनकर, भगवान श्रीहरि बोले-“हे देवगणो! वह कौन-सा दैत्य है, जिसने देवताओं को जीत लिया है? आप सभी देवगण किसके भय से पृथ्वीलोक में भटक रहे हैं? क्या वह दैत्य इतना बलवान है, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया है? तुम निर्भय होकर मुझे सब हाल बताओ.”

भगवान विष्णु के इन स्नेहमयी वचनों को सुनकर देवेन्द्र ने कहा- “हे प्रभु! प्राचीन काल में ब्रह्मवंश में उत्पन्न हुआ नाड़ी जंगम नाम का एक असुर था, जिसका मुर नामक एक पुत्र है, जो चन्द्रवती नामक नगरी में निवास करता है.जिसने अपने बल से मृत्युलोक और देवलोक को जीत लिया हैं और सब देवताओं को देवलोक से निकालकर, अपने दैत्य कुल के असुरों को इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, चन्द्रमा आदि लोकपाल बना दिया है.वह स्वयं सूर्य बनकर पृथ्वी को तापता है और स्वयं मेघ बनकर जल की वर्षा करता है,अतः आप इस बलशाली भयानक असुर का संहार करके देवताओं की रक्षा करें.”

देवेन्द्र के मुख से ऐसे वचन सुन भगवान विष्णु बोले- “हे देवताओं! मैं आपके शत्रु का शीघ्र ही संहार करूँगा.आप सब इसी समय मेरे साथ चन्द्रवती नगरी चलिए.”

देवताओं की पुकार पर भगवान विष्णु तुरन्त ही उनके साथ चल दिए.उधर दैत्यराज मुर ने अपने तेज से जान लिया था कि श्रीविष्णु युद्ध की इच्छा से उसकी राजधानी की तरफ आ रहे हैं, अतः अपने राक्षस योद्धाओं के साथ वह भी युद्ध भूमि में आकर गरजने लगा.देखते-ही-देखते युद्ध शुरू हो गया.युद्ध शुरू होने पर अनगिनत असुर अनेक अस्त्रों-शस्त्रों को धारण कर देवताओं से युद्ध करने लगे, किन्तु देवता तो पहले ही डरे हुए थे, वह अधिक देर तक राक्षसों का सामना न कर सके और भाग खड़े हुए.


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तब भगवान विष्णु स्वयं युद्ध-भूमि में आ गए.दैत्य पहले से भी ज्यादा जोश में भरकर भगवान विष्णु से युद्ध करने लगे.वे अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पर भयंकर प्रहार करने लगे.दैत्यों के आक्रमण वारों को श्रीविष्णु अपने चक्र और गदा के प्रहारों से नष्ट करने लगे.इस युद्ध में अनेक दैत्य सदा के लिए मृत्यु की गोद में समा गए, किन्तु दैत्यराज मुर भगवान विष्णु के साथ निश्चल भाव से युद्ध करता रहा.उसका तो जैसे अभी बाल भी बांका नहीं हुआ था.वह बिना डरे युद्ध कर रहा था.

भगवान विष्णु मुर को मारने के लिए जिन-जिन शस्त्रों का प्रयोग करते, वे सब उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के समान गिरने लगते.अनेक अस्त्रों-शस्त्रों का प्रयोग करने पर भी भगवान विष्णु उससे जीत न सके.तब वे आपस में मल्ल युद्ध करने लगे.भगवान श्रीहरि उस असुर से देवताओं के लिए सहस्र वर्ष तक युद्ध करते रहे, किन्तु उस असुर से न जीत सके.

अन्त में भगवान विष्णु शान्त होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम स्थित अड़तीस कोस लम्बी एक द्वार वाली हेमवती नाम की एक गुफा में प्रवेश कर गए.

उस गुफा में प्रभु ने शयन किया.भगवान विष्णु के पीछे-पीछे वह दैत्य भी चला आया था.भगवान श्रीहरि को सोता देखकर वह उन्हें मारने को तैयार हो गया.वह सोच रहा था कि मैं आज अपने चिर शत्रु को मारकर हमेशा-हमेशा के लिए निष्कण्टक हो जाऊँगा, परन्तु उसकी यह इच्छा पूर्ण न हो सकी, क्योंकि उसी समय भगवान विष्णु की देह से दिव्य वस्त्र धारण किए एक अत्यन्त मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई और राक्षस को ललकारकर उससे युद्ध करने लगी.

उस कन्या को देखकर राक्षस को घोर आश्चर्य हुआ और वह सोचने लगा कि यह ऐसी दिव्य कन्या कहाँ से उत्पन्न हुई और फिर वह असुर उस कन्या से लगातार युद्ध करता रहा, कुछ समय बीतने पर उस कन्या ने क्रोध में आकर उस दैत्य के अस्त्र-शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए.उसका रथ तोड़ डाला.अब तो उस दैत्य को बड़ा ही क्रोध आया और वह सारी मर्यादाएँ भंग करके उस कन्या से मल्ल युद्ध करने लगा.उस तेजस्वी कन्या ने उसको धक्का मारकर मुर्च्छित कर दिया और उसकी मूर्च्छा टूटने से पूर्व ही उसका सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया.सिर काटते ही वह असुर पृथ्वी पर गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुआ बाकी बचे असुर अपने राजा का ऐसा दुःखद अन्त देखकर भयभीत होकर पाताल लोक में भाग गए.

भगवान विष्णु जब निद्रा से जागे तो उस असुर को मरा देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि इस महाबली को किसने मारा है?तब वह तेजस्वी कन्या श्रीहरि से हाथ जोड़कर बोली-

“हे जगदीश्वर! यह असुर आपको मारने को उद्यत था, तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस असुर का वध किया है.”

कन्या की बात सुन भगवान बोले- “तुमने इस असुर को मारा है, अतः हे कन्या! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ.इसे मारकर तुमने तीनों लोकों के देवताओं के कष्ट को हरा है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वरदान मांग लो.मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करूँगा.”

भगवान की बात सुन कन्या बोली- “हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिये कि जो भी मनुष्य या देव मेरा व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएँ और अन्त में उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हो.मेरे व्रत का आधा फल रात्रि को मिले और उसका आधा फल एक समय भोजन करने वाले को मिले.जो श्रद्धालु भक्तिपूर्वक मेरे व्रतको करें, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक को प्राप्त करें।जो मनुष्य मेरे व्रत में दिन तथा रात्रि को एक बार भोजन करे, वह धन-धान्य से भरपूर रहे.कृपा करके मुझे ऐसा वरदान दीजिये.”

भगवान श्रीहरि ने कहा- “हे कन्या! ऐसा ही होगा.मेरे और तुम्हारे भक्त एक ही होंगे और अन्त में संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करेंगे.हे कल्याणी! तुम एकादशी को पैदा हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी एकादशी हुआ और क्योंकि तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुई हो, इसलिए संसार मे तुम उत्पन्ना एकादशी के नाम से जानी जाओगी तथा जो मनुष्य इस दिन व्रत करेंगे, उनके समस्त पाप समूल नष्ट हो जाएँगे.तुम मेरे लिए अब तीज, अष्टमी, नवमी और चौदस से भी अधिक प्रिय हो.तुम्हारे व्रत का फल सब तीर्थों के फल से भी महान होगा.यह मेरा अकाट्य कथन है.”

इतना कहकर, भगवान श्रीहरि उसी स्थान पर अन्तर्धान हो गए.

श्रीकृष्ण ने कहा- “हे पाण्डु पुत्र! एकादशी के व्रत का फल सभी व्रतों व सभी तीर्थों के फल से महान है.एकादशी व्रत करने वाले मनुष्यों के शत्रुओं का मैं जड़ से नाश कर देता हूँ और व्रत करने वाले को मोक्ष प्रदान करता हूँ.उन मनुष्यों के जीवन के जो भी कष्ट होते हैं.मैं उन्हें भी दूर कर देता हूँ.अर्थात मुझे अत्यन्त प्रिय एकादशी के व्रत को करनेवाला प्राणी सभी ओर से निर्भय और सुखी होकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है.”

“हे कुन्ती पुत्र! यह मैंने तुम्हें एकादशी की उत्पत्ति के विषय में बतलाया है.एकादशी व्रत सभी पापों को नष्ट करने वाला और सिद्धि प्रदान करने वाला है.श्रेष्ठ मनुष्यों को दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए.उनमें भेद-भाव करना उचित नहीं है.जो मनुष्य एकादशी माहात्म्य का श्रवण व पठन करेंगे, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होगा.यह मेरा अकाट्य वचन है.”

●◆★ उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा संपन्न ★◆●

नोट:- हमें उम्मीद है आपको अपने सवाल “उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा क्या है” का जवाब मिल गया होगा.इस आर्टिकल में लिखी गयी सभी जानकारी को लिखनें मे बेहद सावधानी बरती गयी है.फिर भी किसी भी प्रकार त्रुटि की संभावना से इनकार नही किया जा सकता.इसके लिए आपके सुझाव कमेंट के माध्यम से सादर आमंत्रित हैं.

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