कामदा एकादशी व्रत कथा क्या है?

कामदा एकादशी व्रत कथा

कामदा एकादशी व्रत कथा

चैत्र शुक्ल पक्ष में आनेवाली एकादशी को कामदा एकादशी कहा जाता है.कामदा एकादशी व्रत कथा के श्रवण से ब्रह्महत्या और पिशाचत्व जैसे पापों और दोषों से मुक्ति मिलती है.इस बार कामदा एकादशी व्रत कथा 15 अप्रैल 2019 को सोमवार के दीन है.

गौण कामदा एकादशी को वैष्णवा कामदा एकादशी भी कहा जाता है.गौण कामदा एकादशी कामदा एकादशी के अगले दिन होती है.इस बार गौण कामदा एकादशी व्रत कथा 16 अप्रैल 2019 को मंगलवार के दीन है.

कामदा एकादशी व्रत कथा की शुरुआत

कामदा एकादशी व्रत कथा प्राचीन समय में भागीपुर नामक एक नगर था.जिस पर पुंडरीक नाम का राजा राज्य करता था.राजा पुंडरीक अनेक ऐश्वर्यों से युक्त था.उसके राज्य में अनेक अप्सराएँ, गन्धर्व, किन्नर आदि वास करते थे.उसी नगर में ललित और ललिता नाम के गायन विद्या में पारंगत गन्धर्व स्त्री-पुरुष अति सम्पन्न घर में निवास करते हुए विहार किया करते थे.उन दोनों में इतना प्रेम था कि वे अलग हो जाने की कल्पना मात्र से ही व्यथित हो उठते थे.

एक बार राजा पुंडरीक गन्धर्वों सहित सभा में विराजमान थे.वहाँ गन्धर्वों के साथ ललित भी गायन कर रहा था.उस समय उसकी प्रियतमा ललिता वहाँ उपस्थित नहीं थी. गायन करते-करते अचानक उसे उसका ख्याल आ गया, जिसके कारण वह अशुद्ध गायन करने लगा.नागराज कर्कोटक ने राजा पुंडरीक से उसकी शिकायत की.इस पर राजा को भयंकर क्रोध आया और उन्होंने क्रोधवश ललित को श्राप दे दिया-

“अरे नीच! तू मेरे सम्मुख गायन करते हुए भी अपनी स्त्री का स्मरण कर रहा है, इससे तू नरभक्षी दैत्य बनकर अपने कर्म का फल भोग”.

ललित गन्धर्व उसी समय राजा पुंडरीक के शाप श्राप से एक भयंकर दैत्य में बदल गया.उसका मुख विकराल हो गया.उसके नेत्र सूर्य, चन्द्र के समान प्रदीप्त होने लगे मुँह से आग की भयंकर ज्वालाएँ निकलने लगीं, उसकी नाक पर्वत की कन्दरा के समान विशाल हो गई और गर्दन पहाड़ के समान दिखायी देने लगी.उसकी भुजाएँ दो-दो योजन लम्बी हो गईं. इस प्रकार उसका शरीर आठ योजन का हो गया.इस तरह राक्षस बन जाने पर वह अनेक दुःख भोगने लगा.

अपने प्रियतम ललित का ऐसा हाल होने पर ललिता अथाह दुःख से व्यथित हो उठी वह अपने पति के उद्धार के लिए विचार करने लगी कि मैं कहाँ जाऊँ और क्या करूँ? किस जतन से अपने पति को इस नरक तुल्य कष्ट से मुक्त कराऊँ?राक्षस बना ललित घोर वनों में रहते हुए अनेक प्रकार के पाप करने लगा.


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उसकी स्त्री ललिता भी उसके पीछे-पीछे जाती और उसकी हालत देखकर विलाप करने लगती.एक बार वह अपने पति के पीछे-पीछे चलते हुए विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई. उस स्थान पर उसने श्रृंगी मुनि का आश्रम देखा. वह शीघ्रता से उस आश्रम में गई और मुनि के सामने पहुँचकर दण्डवत् प्रणाम कर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी-

“हे महर्षि! मैं वीरधन्वा नामक गन्धर्व की पुत्री ललिता हूँ, मेरा पति राजा पुंडरीक के श्राप से एक भयंकर दैत्य बन गया है.उससे मुझे अपार दुःख हो रहा है. अपने पति के कष्ट के कारण मैं बहुत दुखी हूँ. हे मुनिश्रेष्ठ! कृपा करके आप उसे राक्षसजीवन से मुक्ति का कोई उत्तम उपाय बताएँ.”

समस्त वृत्तान्त सुनकर मुनि श्रृंगी ने कहा- “हे पुत्री! चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम कामदा एकादशी है.उसके व्रत करने से प्राणी के सभी मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण हो जाते हैं.यदि तू उसके व्रत के पुण्य को अपने पति को देगी तो वह सहज ही राक्षसजीवन से मुक्त हो जाएगा और राजा का श्राप शान्त हो जाएगा”.

ऋषि के कहे अनुसार ललिता ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया और द्वादशी के दिन ब्राह्मणों के समक्ष अपने व्रत का फल अपने पति को दे दिया और ईश्वर से प्रार्थना करने लगी-

“हे प्रभु! मैंने जो यह उपवास किया है, उसका फल मेरे पतिदेव को मिले, जिससे उनकी राक्षसजीवन से शीघ्र ही मुक्ति हो.”

एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षसजीवन से मुक्त हो गया और अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हुआ. वह अनेक सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत होकर पहले की भाँति ललिता के साथ विहार करने लगा.कामदा एकादशी के प्रभाव से वह पहले की भाँति सुन्दर हो गया और मृत्यु के बाद दोनों पुष्पक विमान पर बैठकर विष्णुलोक को चले गये.

●◆ कामदा एकादशी व्रत कथा संपन्न ◆●

नोट:- हमें उम्मीद है आपको अपने सवाल “कामदा एकादशी व्रत कथा क्या है” का जवाब मिल गया होगा.इस आर्टिकल में लिखी गयी सभी जानकारी को लिखनें मे बेहद सावधानी बरती गयी है.फिर भी किसी भी प्रकार त्रुटि की संभावना से इनकार नही किया जा सकता.इसके लिए आपके सुझाव कमेंट के माध्यम से सादर आमंत्रित हैं.

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