गणेश चतुर्थी व्रत कथा

गणेश चतुर्थी व्रत कथा समाप्त हुयी.

गणेश चतुर्थी व्रत कथा गणेश चतुर्थी के दिन पढ़ी जाती है. गणेश चतुर्थी का त्योहार भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है.हिंदू धर्म के मुताबिक इस दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था.यह त्योहार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को पड़ता है.पुराणों के अनुसार इसी दिन गणेश जी का जन्म हुआ था. भगवान गणेश के जन्मदिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है.

इस दिन भगवान गणेश को बुद्धि,समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है.गणेश उत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव 10 दिन के अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है. और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है. अनंत चतुर्दशी के दिन श्रद्धालुजन बड़े ही धूमधाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए उनकी प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं.

गणेश चतुर्थी व्रत कथा ,पूजन विधि और गणपति पूजा मुहूर्त

ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्य काल के दौरान हुआ था. इसलिए मध्यान के समय को गणेश पूजा के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जाता है. हिंदू समय गणना के आधार पर सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को 5 बराबर भागों में विभाजित किया जाता है. इन पांच भागों को के मध्य को पूजा का मुहूर्त माना जाता है.इस दिन प्रातः काल स्नान आदि करके सोने,तांबे, मिट्टी अथवा गोबर की गणेश जी की प्रतिमा बनाई जाती है. गणेश जी की प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर मुंह पर कोरा कपड़ा बांधकर उस पर स्थापित किया जाता है.

फिर मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाकर पूजन किया जाता है. गणेश जी को दक्षिणा अर्पित करके लड्डुओं का भोग लगाने का विधान है. उसके बाद हरी दूब के 21 अंकों लेकर गणेश जी के 10 नामों पर चढ़ाना चाहिए जो निम्नलिखित है.
वक्रतुंड, एकदंत,कृष्णा,पिंगाक्ष, गजवक्त्र, लंबोदर, विकट,विघ्नराजेन्द्र,घुरमवर्ण,भालचंद्र, विनायक
इसके बाद दस भोगोंको दान कर देना चाहिए.और बाकी बचे लड्डू अपने सेवन के लिए रखनी चाहिए. जहां तक संभव हो तब तक गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए. क्योंकि चंद्रमा के दर्शन करने से कलंक का भागी बनना पड़ता है.

गणेश चतुर्थी व्रत कथा – पहली

गणेश चतुर्थी व्रत कथा
नदी किनारे चौपड़ खेलते हुए शिव पार्वती

कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे. माता पार्वती ने भगवान शिव से समय व्यतीत करने के लिए चौपड़ खेलने को कहा.शिव खेलने के लिए तैयार हो गए. इस खेल में हार जीत का फैसला कौन करेगा यह प्रश्न उनके समक्ष उठा. तो भगवान ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका एक पुतला बनाकर उसे जीवित कर दीया. शिव ने पुतले से कहा, बेटा हम चौपड़ खेलना चाहते हैं. तो हमारे हार जित का फैसला करने वाला कोई नहीं है. इसलिए तुम बताना कि हम दोनों में से कौन हारा और कौन जीता. उसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का चौपड़ खेल शुरू हो गया. यह खेल खेला गया. और सहयोग से तीनों बार माता पार्वती ही जीती.

खेल समाप्त होने के बाद बालक से हार जीत का फैसला करने के लिए कहा गया. बालक ने महादेव को विजई बताया. यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई.क्रोध में बालक को लंगड़ा होने का श्राप दे दिया. बालक ने माता पार्वती से माफी मांगी और कहा कि यह मुझसे अज्ञानतावश ऐसा हुआ है.मैंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया. बालक के क्षमा मांगने पर माता ने कहा, यहां गणेश पूजन के लिए नागकन्या आएंगे. उनके कहे अनुसार तुम गणेश की पूजा करो. और ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे. यह कहकर माता पार्वती शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई .

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एक साल बाद उस स्थान पर नागकन्या आई. उनसे गणेश पूजा की विधि मालूम करके उस बालक ने 1 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया. उसकी श्रद्धा से गणेश जी प्रसन्न हुए उन्होंने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिए कहा. उस पर उस बालक ने कहा, है विनायक मुझ में इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चल कर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं.गणेश यह देख प्रसन्न हो गए. तब उन्होंने बालक को वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए. इसके बाद मैं बालक कैलाश पर्वत पर पहुंच गया.

कैलाश पर्वत पर पहुंचने के बाद उसने अपनी कथा प्रथम शिव जी को सुनाई.उस दिन से माता पार्वती शिवजी से विमुख हो गई थी.तब भगवान शिव ने भी बालक के बताए अनुसार 21 दिनों तक श्री गणेश व्रत किया. इस व्रत के प्रभाव से माता पार्वती के मन में भगवान शिव के लिए जो नाराजगी थी, वह समाप्त हो गई. तभी इस व्रत का विधि भगवान शंकर ने पार्वती को बताए .यह सुनकर मां पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जागृत हुई. उन्होंने 21 दिन तक श्री गणेश का व्रत किया. इस व्रत के फल स्वरुप पार्वती की कार्तिकेय से मिलने की इच्छा पूर्ण हुयी. गणेश चतुर्थी व्रत कथा समाप्त हुयी.

गणेश चतुर्थी व्रत कथा – दूसरी

गणेश चतुर्थी व्रत कथा
भगवान श्रीकृष्ण

पुराणी कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण मनी चोरी करने का झूठा आरोप लगा था. झूठे आरोप में लिप्त भगवान की स्थिति देखकर नारद ऋषि ने उन्हें बताया. कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखा था.इसकी वजह से उनको भगवान गणेश का श्राप लगा है. नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि, भगवान गणेश ने चंद्रदेव को श्राप दिया था.जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी के दौरान चंद्रमा के दर्शन करेगा.उसकी ब्रह्मविद्या भंग हो जायेगी और उसे झूठे आरोपों का सामाना करना पड़ेगा.और वह समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जाएगा.इसके बाद भगवान कृष्ण ने नारद से इस शाप से मुक्ति का रास्ता पूछा. नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति पाने के लिए गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गए.गणेश चतुर्थी व्रत कथा समाप्त हुयी.

गणेश चतुर्थी व्रत कथा – तीसरी

गणेश चतुर्थी व्रत कथा
राजा नल और राणी दमयंती का काल्पनिक चित्र

पुराने समय में एक बहादुर राजा राज्य करते थे.उनका नाम नल था और उनकी पत्नी अत्यंत रूपवान थी. उसका नाम दया दमयंती था. राजा बहुत ही अच्छी से प्रजा का पालन करते थे.जिससे उनकी प्रजा भी सुखी थी. किसी को किसी प्रकार का दुख नहीं था. लेकिन एक बार किसी बात के कारण राजा नल घोड़े से गिर गए और उनके ऊपर बहुत सी विपत्ति आन पड़ी. उनके हाथीखाने के हाथियों को चोर चुरा कर ले गए.घुड़साल के सभी घोड़े भी चोरी हो गए.डाकुओं ने उनके महल पर धावा बोलाऔर सब कुछ लूटकर महल को आग लगा दी. इसके बाद राजा को जुए की लत लग गयी. राजा ने जुए में सब कुछ गवा दिया. राजा रानी नगर छोड़कर राज्य से बाहर हो गए. वन में इधर उधर भटकने लगे.घूमते-घूमते एक बार राजा रानी एक तेली के यहां पहुंचे.

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तेली ने दोनों को काम पर रख लिया.उसे पता नहीं था कि वह शख्स राजा नल और दमयंती उनकी रानी है. उसने राजा नल को कोल्हू के बैल हाकने का काम दिया. और दमयन्ति को साफसफाई करने का काम दिया. राजा रानी ने कभी काम नहीं किया था.उने जल्दी थकान हो जाती.इससे तेली उन्हें गालिया देता.तेली की कडवी बातों से राजा परेशांन हुआ. राजा रानी ने वह जगह छोड़ दी.राजा अपने जान पहचान वाले जगहों पर गया. लेकिन श्राप के कारण उसे कोई जगह नहीं मिली. इसी दौरान एक बार बन में भटकते हुए राजा अपनी रानी से बिछड़ गया. दमयंती जंगल में अकेले रह गयी.

भटकते हुए रानी की मुलाकात अचानक ऋषि से हो गई.ऋषि के पूछने पर दमयंती ने सारी बात ऋषि को बताई. तब ऋषि ने कहा कि, पुत्री तुम गणेश जी की पूजा किया करो. और गणेश चतुर्थी का व्रत किया करो. रानी के पास व्रत करने का कोई साधन नहीं था. लेकिन जैसे तैसे रानी ने गणेश जी का व्रत किया. गणेश जी के व्रत रखने से रानी पर भगवान गणेश प्रसन्न हो गए.गणेशजी ने रानी को आशीर्वाद दिया.गणेशजी के आशीर्वाद से रानी को उसका पति मिल गया. राजा को उसका खोया हुआ राज्य मिल गया. राजा रानी गणेश जी के भक्त हो गए.गणेश चतुर्थी व्रत कथा समाप्त हुयी.

गणेश चतुर्थी व्रत कथा – चौथी

गणेश चतुर्थी व्रत कथा
भगवान शिव को रोखते हुए गणेशजी

एक बार भगवती नामक नदी पर भगवान शंकर स्नान करने गए.उनके चले जाने के बाद पार्वती जी ने अपने तन की मैल से एक पुतला बनाया. जिसका नाम उन्होंने गणेश रखा. गणेश जी को उन्होंने अपने द्वार पर एक मुद्गल हाथ में देकर बिठा दिया. पार्वतीजी ने गणेशजी से कहा, कि जब तक मैं स्नान करूं किसी पुरुष को अंदर मत आने देना. कुछ देर बाद भगवान शंकर वापस घर आते हैं.जब शंकर भगवान आए तो बालक बाहर ही बैठा हुआ था. जब शंकरजी अंदर जाने लगे तो,गणेशजी उन्हें अंदर जाने से रोका. और कहा कि माता स्नान कर रही है.इसलिए आप अंदर नहीं जा सकते. यह सुनकर शिव हंसते है और वहासे चले जाते है.

जब यह बात शिव के गणों को पता चलती है. तब वह लोग गणेशजी को भगाने के लिए आते है. जब गणेश उनकी नहीं सुनते,तब गण गणेशजी से युद्ध करते हैं.लेकिन गणेशजी सभी को मार भगाते है. भयभीत गन ब्रह्मा जी को गणेशजी को समझाने के लिए बुलाते है कि इस बालक को यहाँ से हटा दें.लेकिन जब ब्रम्हा गणेशजी को हटा ने जाते है.तो गणेशजी उनकी दाढ़ी मूछ उखाड़ डालते है. यह पूरी कहानी गन शिवजी को सुनाते है. यह सुनकर शिव क्रोधित हो गए. इसी क्रोध में शिव ने बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया, तब उनकी क्रोध शांत हुआ.

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जब पार्वती जी को उस बालक की आवाज सुनाई दी, वे दौड़ती हुई बाहर आई.उन्होंने देखा उस बालक का सिर धड़ से अलग पड़ा है. जिसे देखकर वह क्रोधित हो गई.जिससे धरती में प्रलय मच गया. तब सभी देवी देवताओं,ऋषि-मुनि पार्वती माता को शांत होने की प्रार्थना की. और कहां की, है देवी क्षमा करो. आपके पति यहां पर अनुपस्थित है.उनका ध्यान करो आप के क्रोध से धरती में विनाश हुआ जा रहा है. तब माता बोली मेरे बेटे को किसी भी तरह जीवित करो और उसे पूजने होने का आशीर्वाद दो.

यह सब सुन शंकर जी ने अपने गन से कहा,जाओ उत्तर दिशा की ओर जन्मा ऐसे बच्चे का सर लेकर आओ, जो आज ही जन्मा हो. लेकिन गणों को कोई ऐसा बच्चा ना मिला. अंत में एक हाथी का बच्चा मिला.गण उसका सर ले आए और वही सिर बालक के शरीर से जोड़ दिया गया.और सभी देवी-देवता उस बालक को आशीर्वाद दिया.यही बालक गणेश नाम प्रसिद्ध हुआ. साथी शंकर जी ने उसे अपनी पुत्र स्वीकार किया. जब यह घटना घटी उस दिन भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी थी.तभी से यह त्योहार मनाया जाता है.गणेश चतुर्थी व्रत कथा समाप्त हुयी.

गणेश चतुर्थी व्रत कथा क्यों पढ़ी जाती है?

गणेश चतुर्थी व्रत कथा पढने से घर में सुख, समृद्धि और संपन्नता आती है.हिंदु धर्म के कई लोग इस दिन व्रत भी रखते हैं. कहा जाता है कि,व्रत रखने से भगवान गणेश खुश होते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं.

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