जया एकादशी व्रत कथा क्या है ?

जया एकादशी व्रत कथा

जया एकादशी व्रत कथा

माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है.जया एकादशी व्रत कथा से मनुष्य भुत,पिशाच जैसे जीवों में जन्म लेने से बच जाता है.इस बार जया एकादशी 16 फरवरी 2019 को शनिवार के दी है.

जया एकादशी व्रत कथा की शुरुआत

जया एकादशी व्रत कथा एक बार देवताओं के राजा इंद्र नंदन वन में भ्रमण कर रहे थे.चारों तरफ किसी उत्सव का-सा माहौल था.गांधर्व गा रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य कर रही थीं. वहीं पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या ने माल्यवान नामक गंधर्व को देखा और उस पर आसक्त होकर अपने हाव-भाव से उसे रिझाने का प्रयास करने लगी.माल्यवान भी उस गंधर्व कन्या पर आसक्त होकर अपने गायन का सुर-ताल भूल गया.इससे संगीत की लय टूट गई और संगीत का सारा आनंद बिगड़ गया.सभा में उपस्थित देवगणों को यह बहुत बुरा लगा.यह देखकर देवेंद्र भी रूष्ट हो गए.संगीत एक पवित्र साधना है.इस साधना को भ्रष्ट करना पाप है.

अतःक्रोध वश इंद्र ने पुष्पवती तथा माल्यवान को शाप देते हुए कहा,”संगीत की साधना को अपवित्र करने वाले माल्यवान और पुष्पवती!तुमने देवी सरस्वती का घोर अपमान किया है.अतः तुम्हें मृत्युलोक में जाना होगा.गुरुजनों की सभामें असंयम और लज्जाजनक प्रदर्शन करके तुमने गुरुजनों का भी अपमान किया है, इसलिए इंद्रलोक में तुम्हारा रहना अब वर्जित है, अब तुम अधम पिशाच जीवन बिताओगे”.

इंद्र का शाप सुनकर वे अत्यंत दुखी हुए और हिमालय पर्वत पर पिशाच जिव में दुःखपूर्वक जीवनयापन करने लगे.उन्हें गंध, रस, स्पर्श आदि का तनिक भी बोध नहीं था.वहीं उन्हें असहनीय दुःख सहने पड़ रहे थे.रात-दिन में उन्हें एक क्षण के लिए भी नींद नहीं आती थी. उस स्थान का वातावरण अत्यंत शीतल था, जिसके कारण उनके रोएं खड़े हो जाते थे, हाथ-पैर सुन्न पड़ जाते थे, दांत बजने लगते थे.


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एक दिन उस पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा- ‘न मालूम हमने पिछले जन्म में कौन-से पाप किए हैं, जिसके कारण हमें इतनी दुःखदायी यह पिशाच जिव प्राप्त हुई है? पिशाच जिव से नरक के दुःख सहना कहीं ज्यादा उत्तम है.’ इसी प्रकार के अनेक विचारों को कहते हुए अपने दिन व्यतीत करने लगे.

भगवान की कृपा से एक बार माघ के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी के दिन इन दोनों ने कुछ भी भोजन नहीं किया और न ही कोई पाप कर्म किया.उस दिन मात्र फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और महान दुःख के साथ पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे. उस दिन सूर्य भगवान अस्ताचल को जा रहे थे. वह रात इन दोनों ने एक-दूसरे से सटकर बड़ी कठिनता से काटी.

दूसरे दिन प्रातः काल होते ही प्रभु की कृपा से इनकी पिशाच जिव से मुक्ति हो गई और पुनः अपनी अत्यंत सुंदर अप्सरा और गंधर्व की देह धारण करके तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत होकर दोनों स्वर्ग लोक को चले गए. उस समय आकाश में देवगण तथा गंधर्व इनकी स्तुति करने लगे.

इंद्रलोक में जाकर इन दोनों ने देवेंद्र को दण्डवत् किया.देवेंद्र को भी उन्हें उनके रूप में देखकर महान विस्मय हुआ और उन्होंने पूछा,”तुम्हें पिशाच जिव से किस प्रकार मुक्ति मिली?उसका पूरा वृत्तांत मुझे बताओ.

देवेंद्र की बात सुन माल्यवान ने कहा,”हे देवेन्द्र श्रीहरि की कृपा तथा जया एकादशी के व्रत के पुण्य से हमें पिशाच जिव से मुक्ति मिली है”.

देवेंद्र ने कहा,”हे माल्यवान! एकादशी व्रत करने से तथा भगवान श्रीहरि की कृपा से तुम लोग पिशाच जिव को छोड़कर पवित्र हो गए हो, इसलिए हम लोगों के लिए भी वंदनीय हो गए हो.अब आप प्रसन्नतापूर्वक देवलोक में निवासकर सकते हैं.

●◆जया एकादशी व्रत कथा संपन्न◆●

नोट:- हमें उम्मीद है आपको अपने सवाल ” जया एकादशी व्रत कथा क्या है” का जवाब मिल गया होगा.इस आर्टिकल में लिखी गयी सभी जानकारी को लिखनें मे बेहद सावधानी बरती गयी है.फिर भी किसी भी प्रकार त्रुटि की संभावना से इनकार नही किया जा सकता.इसके लिए आपके सुझाव कमेंट के माध्यम से सादर आमंत्रित हैं.

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