परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा क्या है?

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

भाद्रपद शुक्ल एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा का श्रवण किया जाता है.इस एकादशी को पार्श्व एकादशी और जयंती एकादशी के नाम से भी जाना जाता है.परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा की जाती है.

इस बार परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा 9 सितंबर 2019 को सोमवार के दिन श्रवण करना चाहिए.

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा की शुरुआत

युधिष्ठिर बोले- “हे वासुदेव! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए”.

भगवान श्रीकृष्ण बोले-“हे धर्मराज! पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करनेवाली, उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूं तुम ध्यानपूर्वक सुनो.यह एकादशी पद्मा या परिवर्तिनी एकादशी भी कहलाती है.इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है.पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं.

जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरे वामन रूप की पूजा करता है,उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं.अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें.जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं. जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया.अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए.इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं.

भगवान श्रीकृष्ण के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले -“हे भगवान! मुझे अतिसंदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि को बांधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएं कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है.आप मुझसे विस्तार से बताइए.”

श्रीकृष्ण बोले-“हे धर्मराज! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें.”

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था.वह मेरा परम भक्त था.विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया.इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान के पास गए.

बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुतिकरने लगे. अत: मैंने वामन रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया.इतनी वार्ता सुनकर राजा

युधिष्ठिर बोले- “हे जनार्दन! आपने वामन रूप धारण करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता?”

श्रीकृष्ण बोले- “मैंने वामन रूप धर बलि से तीन पग भूमि की याचना करते हुए कहा,ये मुझको तीन लोक के समान है और हे राजन यह तुमको अवश्य ही देनी होगी.राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन पग भूमि का संकल्प मुझको दे दिया और मैंने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहां तक कि भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख, उसके ऊपर मस्तक स्थापित किया.


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सूर्य, चंद्रमा आदि सब ग्रह गण, योग, नक्षत्र,इंद्रादिक देवता और शेष आदि सब नागगणों ने विविध प्रकार से वेद सूक्तों से प्रार्थना की.तब मैंने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा कि हे राजन! एक पद से पृथ्वी, दूसरे से स्वर्गलोक पूर्ण हो गए.अब तीसरा पग कहां रखूं?तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और मैंने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया जिससे मेरा वह भक्त पाताल को चला गया.फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर मैंने कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूंगा.विरोचन पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर मेरी मूर्ति स्थापित हुई.इसी प्रकार दूसरी क्षीरसागर में शेषनाग के पष्ठ पर हुई.

हे राजन! इस एकादशी को भगवान शयन करते हुए करवट लेते हैं, इसलिए तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु का उस दिन पूजन करना चाहिए. इस दिन तांबा, चांदी, चावल और दही का दान करना उचित है. रात्रि को जागरणअवश्य करना चाहिए.जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं. जो पापनाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है.

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा संपन्न

नोट:- हमें उम्मीद है आपको अपने सवाल “परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा क्या है” का जवाब मिल गया होगा.इस आर्टिकल में लिखी गयी सभी जानकारी को लिखनें मे बेहद सावधानी बरती गयी है.फिर भी किसी भी प्रकार त्रुटि की संभावना से इनकार नही किया जा सकता.इसके लिए आपके सुझाव कमेंट के माध्यम से सादर आमंत्रित हैं.

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