पापमोचनी एकादशी व्रत कथा क्या है?

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी व्रत कथा श्रवण करते है.पापमोचनी एकादशी के व्रत से इंसान को सारे पापों से मुक्ति मिलती है.इस दिन भगवान विष्णु के चतुर्भुज अवतार की पूजा की जाती है.इस बार पापमोचनी एकादशी 31 मार्च 2019 को रविवार के दिन है.

पापमोचनी एकादशी के एक दिन बाद वैष्णव पापमोचनी एकादशी को मनाया जाता है.इस बार वैष्णव पापमोचनी एकादशी व्रत कथा 1 अप्रैल 2019 को सोमवार के दिन है.

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा की शुरुआत

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक एक वन था.उसमें अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार किया करती थीं.वहाँ सदैव वसन्त का मौसम रहता था,अर्थात उस जगह सदा नाना प्रकार के पुष्प खिले रहते थे.कभी गन्धर्व कन्याएँ विहार किया करती थीं, कभी देवेन्द्र अन्य देवताओं के साथ क्रीड़ा किया करते थे.उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि भी तपस्या में लीन रहते थे. वे शिवभक्त थे.

एक दिन मञ्जुघोषा नामक एक अप्सरा ने उनको मोहित कर उनकी निकटता का लाभ उठाने की चेष्टा की,इसलिए वह कुछ दूरी पर बैठ वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी.उसी समय शिव भक्त महर्षि मेधावी को कामदेव भी जीतने का प्रयास करने लगे.कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू का धनुष बनाया.कटाक्ष को उसकी प्रत्यन्चा बनाई और उसके नेत्रों को मञ्जुघोषा अप्सरा का सेनापति बनाया.इस तरह कामदेव अपने शत्रु भक्त को जीतने को तैयार हुआ.

उस समय महर्षि मेधावी भी युवावस्था में थे और काफी हृष्ट-पुष्ट थे. उन्होंने यज्ञोपवीत तथा दण्ड धारणकर रखा था. वे दूसरे कामदेव के समान प्रतीत हो रहे थे.उस मुनि को देखकर कामदेव के वश में हुई मञ्जुघोषा ने धीरे-धीरे मधुर वाणी से वीणा पर गायन शुरू किया तो महर्षि मेधावी भी मञ्जुघोषा के मधुर गाने पर तथा उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गए.

अप्सरा मेधावी मुनि को कामदेव से पीड़ित जानकर उनसे आलिङ्गन करने लगी.महर्षि मेधावी उसके सौन्दर्य पर मोहित होकर शिव रहस्य को भूल गए और काम के वशीभूत होकर उसके साथ रमण करने लगे.काम के वशीभूत होने के कारण मुनि को उस समय दिन-रात का कुछ भी ज्ञान न रहा और काफी समय तक वे रमण करते रहे.


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तदुपरान्त मञ्जुघोषा उस मुनि से बोली-“हे ऋषिवर! अब मुझे बहुत समय हो गया है, अतः स्वर्ग जानेकी आज्ञा दीजिये”.

अप्सरा की बात सुनकर ऋषि ने कहा- “हे मोहिनी! सन्ध्या को तो आयी हो, प्रातःकाल होने पर चली जाना”.ऋषि के ऐसे वचनों को सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी. इसी प्रकार दोनों ने साथ-साथ बहुत समय बिताया.

मञ्जुघोषा ने एक दिन ऋषि से कहा- “हे विप्र! अब आप मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिये”.

मुनि ने इस बार भी वही कहा- “हे रूपसी! अभी ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है, कुछ समय और ठहरो”.

मुनि की बात सुन अप्सरा ने कहा- “हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत लम्बी है.आप स्वयं ही सोचिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया.अब और ज्यादा समय तक ठहरना क्या उचित है?”

अप्सरा की बात सुन मुनि को समय का बोध हुआ और वह गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे. जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते सत्तावन वर्ष व्यतीत हो चुके हैं तो उस अप्सरा को वह काल का रूप समझने लगे. इतना ज्यादा समय भोग-विलास में व्यर्थ चला जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया.अब वह भयंकर क्रोध में जलते हुए उस तप नाश करने वाली अप्सरा की तरफ भृकुटी तानकर देखने लगे.क्रोध से उनके अधर काँपने लगे और इन्द्रियाँ बेकाबू होने लगीं.

क्रोधसे थरथराते स्वर में मुनि ने उस अप्सरा से कहा-

“मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा! तू महा पापिन और बहुत ही दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है.अब तू मेरे श्राप से पिशाचिनी बन जा.”

मुनि के क्रोधयुक्त शाप श्राप से वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई.

यह देख अप्सरा व्यथित होकर बोली- “हे ऋषिवर! अब मुझ पर क्रोध त्यागकर प्रसन्न होइए और कृपा करके बताइये कि इस श्राप का निवारण किस प्रकार होगा?विद्वानों ने कहा है, साधुओं की सङ्गतअच्छा फल देने वाली होती है और आपके साथ तो मेरे बहुत वर्ष व्यतीत हुए हैं, अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए, अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा”.


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मञ्जुघोषा की बात सुनकर मुनि को अपने क्रोध पर अत्यन्त ग्लानि हुई साथ ही अपनी अपकीर्ति का भय भी हुआ, अतः पिशाचिनी बनी मञ्जुघोषा से मुनि ने कहा- “तूने मेरा बड़ा बुरा किया है, किन्तु फिर भी मैं तुझे इस श्राप से मुक्ति का उपाय बतलाता हूँ. चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम पापमोचिनी है. उस एकादशी का उपवास करने से तेरी पिशाचिनी की देह से मुक्ति हो जाएगी.’ऐसा कहकर मुनि ने उसको व्रत का सब विधान समझा दिया.फिर अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए वे अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गये.

च्यवन ऋषि ने अपने पुत्र मेधावी को देखकर कहा- “हे पुत्र! ऐसा क्या किया है तूने कि तेरे सभी तप नष्ट हो गए हैं? जिससे तुम्हारा समस्त तेज मलिन हो गया है?’

मेधावी मुनि ने लज्जा से अपना सिर झुकाकर कहा- “पिताश्री! मैंने एक अप्सरा से रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है.इसी पाप के कारण सम्भवतः मेरा सारा तेज और मेरे तप नष्ट हो गए हैं. कृपा करके आप इस पापसे छूटने का उपाय बतलाइये”.

ऋषि ने कहा- “हे पुत्र! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का विधि तथा भक्तिपूर्वक उपवास करो, इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे”.

अपने पिता च्यवन ऋषि के वचनों को सुनकर मेधावी मुनि ने पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया. उसके प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए. मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचिनी एकादशी का उपवास करने से पिशाचिनी की देह से छूट गई और पुनः अपना सुन्दर रूप धारण कर स्वर्गलोक चली गई.

●◆★ पापमोचनी एकादशी व्रत कथा संपन्न ★◆●

नोट:- हमें उम्मीद है आपको अपने सवाल “पापमोचनी एकादशी व्रत कथा क्या है” का जवाब मिल गया होगा.इस आर्टिकल में लिखी गयी सभी जानकारी को लिखनें मे बेहद सावधानी बरती गयी है.फिर भी किसी भी प्रकार त्रुटि की संभावना से इनकार नही किया जा सकता.इसके लिए आपके सुझाव कमेंट के माध्यम से सादर आमंत्रित हैं.

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