पुत्रदा एकादशी व्रत कथा क्या है ?

पुत्रदा एकादशी व्रत कथा

पुत्रदा एकादशी व्रत कथा क्या है ?

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा संतान प्राप्ति के लिए किया जाता है.इस दिन व्रत रखकर भगवान का नामस्मरण करने से संतान से जुडी सभी समस्याओं का समाधान होता है.इस बार पौष पुत्रदा एकादशी 17 जनवरी 2019 को गुरुवार के दिन है.

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा की शुरुआत

भगवान कृष्ण के चरणों में अर्जुन ने प्रणाम कर श्रद्धापूर्वक प्रार्थना की और उनसे पूछा-“हे मधुसूदन,है प्रभु! अब आप पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के माहात्म्य को बताने की कृपा करें.इस एकादशी नाम विधान क्या है! इस दिन किस देवता का पूजन किया जाता है?

श्रीकृष्ण ने कहा– “प्रिय अर्जुन! पौष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पुत्रदा है. इसका पूजन पूर्व में बताई गई विधि अनुसार ही करना चाहिए.इस उपवास में भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए.समस्त संसार में पुत्रदा एकादशी उपवास के समान अन्य दूसरा व्रत नहीं है.इसके पुण्य से प्राणी तपस्वी, विद्वान और धनवान बनता है.इस एकादशी से सम्बंधित जो कथा प्रचलित है, उसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ, इसे श्रद्धापूर्वक श्रवण करो.

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा

पुत्रदा एकादशी व्रत कथापौराणिक काल में भद्रावती नामक एक पवित्र और विशाल नगर था.इस नगर में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था.सुकेतुमान की कोई संतान नहीं थी.उसकी पत्नी का नाम शैव्या था.सुकेतुमान के मन में इस बात की बड़ी चिंता थी कि उसके पश्च्यात उसे और उसके पूर्वजों को कौन पिंडदान देगा? सुकेतुमानके पितर भी व्यथित हो पिंड लेते थे कि सुकेतुमान के बाद उन्हें कौन पिंड देगा.

सुकेतुमान ऐश्वर्यशाली था,उसके पास बंधु-बांधव, राज्य, हाथी, घोड़ा आदि सभी सुविधाएं लेकिन वह इनसे संतुष्ट नहीं था.इसका एकमात्र कारण पुत्रहीन होना था.बिना पुत्र के पितरों और देवताओं से ऋण नहीं हो सकते.इस तरह राजा रात-दिन इसी चिंता में घुला करता था.इस चिंता के कारण एक दिन वह इतना दुखी हो गया कि उसके मन में अपने शरीर को त्याग देने की इच्छा उत्पन्न हो गई. किंतु वह सोचने लगा कि आत्महत्या करना तो महापाप है.अतः उसने इस विचार को मन से निकाल दिया.

एक दिन इन्हीं विचारों में डूबा हुआ सुकेतुमान घोड़े पर सवार होकर वन में चला गया.वन में पोहुचने के बाद सुकेतुमान पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा.उसने वन में देखा कि मृग, बाघ, सिंह, बंदर आदि विचरण कर रहे हैं.हाथी शिशुओं और हथिनियों के बीच में विचर रहा है.उस वन में राजा ने देखा कि कहीं तो सियार कर्कश शब्द निकाल रहे हैं और कहीं मोर अपने परिवार के साथ नाच रहे हैं.वन के दृश्यों को देखकर राजा और ज्यादा दुखी हो गया कि उसके पुत्र क्यों नहीं हैं? इसी सोच-विचार में दोपहर हो गई.वह सोचने लगा कि मैंने अनेक यज्ञ किए हैं और ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन कराया है, किंतु फिर भी मुझे यह दुख क्यों मिल रहा है? आखिर इसका कारण क्या है? अपनी व्यथा किससे कहूं? कौन मेरी व्यथा का समाधान कर सकता है?

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अपने विचारों में खोए राजा को प्यास लगी.वह पानी की तलाश में आगे बढ़ा.कुछ दूर जाने पर उसे एक सरोवर मिला.उस सरोवर में कमल पुष्प खिले हुए थे.सारस, हंस, घड़ियाल आदि जल-क्रीड़ा में मग्न थे.सरोवर के चारों तरफ ऋषियों के आश्रम बने हुए थे.अचानक राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे.इसे शुभ शगुन समझकर राजा मन में प्रसन्न होता हुआ घोड़े से नीचे उतरा और सरोवर के किनारे बैठे हुए ऋषियों को प्रणाम करके उनके सामने बैठ गया.

ऋषिमुनि बोले- ‘हे राजा! हम तुमसे प्रसन्न हैं.तुम्हारी जो इच्छा है, हमसे कहो.’

सुकेतुमान बोला- ‘हे मुनिश्रेष्ठ! आप कौन हैं? और किसलिए यहां रह रहे हैं?’

ऋषिमुनि बोले- ‘राजा! आज पुत्रदा एकादशी है.आजसे पांच दिन बाद माघ स्नान है और हम सब इस सरोवर में स्नान करने आए हैं।

सुकेतुमान बोला-‘हे मुनिश्रेष्ठ! मेरा भी कोई पुत्र नहीं है, अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे एक पुत्र का वरदान वीजिए।

ऋषिमुनि बोले- ‘हे राजा! आज पुत्रदा एकादशी है.आप इसका उपवास करें.भगवान श्रीहरि की अनुकम्पा से आपके घर अवश्य ही पुत्र होगा.

सुकेतुमान ने मुनि के वचनों के अनुसार उस दिन उपवास किया और द्वादशी को व्रत का पारण किया और ऋषियों को प्रणाम करके वापस अपनी नगरी आ गया.भगवान श्रीहरि की कृपा से कुछ दिनों बाद ही रानी ने गर्भ धारण किया और नौ माह के पश्चात उसके एक तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ.यह राजकुमार बड़ा होने पर अत्यंत वीर, धनवान, यशस्वी और प्रजापालक बना.

●◆★समाप्त★◆●

अर्जुन को पुत्रदा एकादशी व्रत कथा सुनाने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने कहा –

श्रीकृष्ण-” हे अर्जुन! संतान की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का उपवास करना चाहिए. पुत्र प्राप्ति के लिए इससे बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं है.जो कोई व्यक्ति पुत्रदा एकादशी के माहात्म्य को पढ़ता व श्रवण करता है तथा विधानानुसार इसका उपवास करता है, उसे सर्वगुण सम्पन्न पुत्ररत्न की प्राप्ति होती है.श्रीहरि की अनुकम्पा से वह मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है.”

नोट:- हमें उम्मीद है आपको अपने सवाल ” पुत्रदा एकादशी व्रत कथा क्या है” का जवाब मिल गया होगा.इस आर्टिकल में लिखी गयी सभी जानकारी को लिखनें मे बेहद सावधानी बरती गयी है.फिर भी किसी भी प्रकार त्रुटि की संभावना से इनकार नही किया जा सकता.इसके लिए आपके सुझाव कमेंट के माध्यम से सादर आमंत्रित हैं.

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