महामृत्युंजय मंत्र क्या है ?

महामृत्युंजय मंत्र

महामृत्युंजय मंत्र का स्वरुप

महामृत्युंजय मंत्र का स्वरुप कुछ इस प्रकार है :-

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे,

सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्.

उर्वारुकमिव बन्धनान्

मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

महामृत्युंजय मंत्र जाप का अर्थ

अल्पायु से मुक्ति दिलाने वाले महामृत्युंजय मंत्र जाप का अर्थ कुछ इस तरह है.

“हे त्रिनेत्रधारी!हे समस्त संसार के पालनहार! हम आपसे आराधना करते हैं.विश्व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्यु न कि मोक्ष से कृपया हमें मुक्ति दिलाएं.”


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महामृत्युंजय मंत्र जाप की संख्या

हिंदु पुराणों में महामृत्युंजय मंत्र जाप के कुछ नियम बताए गए है.अलग अलग कार्यो के लिए मंत्र का जाप अलग अलग संख्या में करना चाहिए.

  • भुत पिशाच से भय,आकस्मिक मृत्यु से भय यां अन्य किसी भी भय से छुटकारा पाने के लिए 1100 बार महामृत्युंजय मंत्र जाप करना चाहिए.
  • अपमृत्य अर्थात अग्नि में जलकर, पानी में डूबकर, सर्प आदि किसी विषधर जन्तु के काटने पर उसके दुष्प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए 10000 बार महामृत्युंजय मंत्र जाप करना चाहिए.
  • निरोगी तन और मन,दीर्घकाल से चली आ रही बिमारी के निवारण के लिए 11000 बार महामृत्युंजय मंत्र जाप करना चाहिए.
  • स्वस्थ, सुंदर और पराक्रमी पुत्र के प्राप्ति के लिए 1,25,000 बार महामृत्युंजय मंत्र जाप करना चाहिए.

महामृत्युंजय मंत्र जाप की उत्पत्ति

महामृत्युंजय मंत्र जाप

पुराणे समय की बात है,पृथ्वी पर एक आश्रम में महान तपस्वी ऋषि मृकण्डु और उनकी पत्नी मरुद्धति रहती है.एक बार ऋषि मृकण्डु और उन पत्नी मरुद्मति ने पुत्र की प्राप्ति के लिए तपस्या करने का फैसला किया.ऋषि और उनकी पत्नी ने भगवान शिव की प्रार्थना शुरू कर दी.भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न हो गए.भगवान शिव ने दंपत्ति को वरदान मांगने को कहा.ऋषि और पत्नी ने शिव से वरदान के रूप में तेजस्वी पुत्र को माँगा.दंपत्ति की मांग सुन शिव ने उन्हें दो विकल्प दिए.इन विकल्पों में अल्पायु के साथ एक बुद्धिमान बेटा या कम बुद्धि लेकिन दीर्घायु के साथ एक बेटा था.

मृकण्डु और पत्नी ने पहले विकल्प का चयन किया और उन्हें मार्कंडेय नाम के बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति हुई.मार्कंडेय अल्पायु था, उसका जीवन काल मात्र 16 वर्ष था.जब मार्कंडेय का जीवनकाल पूरा होने वाला था तब उसके माता पिता को चिंता होने लगी.धीरे धीरे मार्कंडेय को अपने भाग्य के बारे में पता चला, तो उसने शिवलिंग के सामने बैठ भगवान शिव की तपस्या करना शुरू की.तपस्या करते करते मार्कंडेय का जीवनकाल पूर्ण हुआ और उन्हें लेने के लिए यमदूत आये.


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यम ने मार्कंडेय को अपने साथ चलने के लिए कहा. मार्कंडेय ने यम की बात को अनदेखा कर दिया और अपनी तपस्या शुरू रखी.मार्कंडेय ने अपनी बाहों को शिवलिंग के चारों ओर लपेटकर भगवान शिव से दया की मांग की.यम ने मार्कंडेय की शिवलिंग से दूर करने की कोशिश की लेकिन मार्कंडेय शिवलिंग से अलग होने का नाम नही ले रहे थे.तब यम ने जबरदस्ती मार्कंडेय को शिवलिंग से अलग करने की कोशिश की,लेकिन इस कोशिश में वे खुद ही शिवलिंगपर गिर गये.इस से भगवान शिव क्रोधित हो गए और शिवलिंग से प्रकट होकर सजा के तौर पर यम को मार दिया.

यम की मृत्यु से ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया. जीवनचक्र का खेल बिगड़ गया.इस बात से परेशांन देवगन भगवान ब्रम्हाजी के पास गए और यम को जीवित करने की बीनती करने लगे.ब्रम्हाजी ने कहा यम को केवल भगवान शिव ही जीवित कर सकते है.तब ब्रम्हाजी समेत सभी देवतागन भगवान शिव के पास गए और यम को जीवित करने की प्रार्थना करने लगे.देवताओं की प्रार्थना को सुनकर भगवान शिव ने यम को इस शर्त पर पुनर्जीवित किया, कि मार्कंडेय हमेशा के लिए जीवित रहेगा.भगवान शिव की आज्ञा से यम जीवित हो गया.यम ने मार्कंडेय को “महामृत्युंजय मंत्र जाप” करवाया.यहीं से इस मंत्र की उत्पति हुई.मार्कंडेय ने “महामृत्युंजय मंत्र जाप” किया और वे दीर्घायु हो गए.

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नोट:- इस आर्टिकल में लिखी गयी सभी जानकारी को लिखनें मे बेहद सावधानी बरती गयी है.फिर भी किसी भी प्रकार त्रुटि की संभावना से इनकार नही किया जा सकता.इसके लिए आपके सुझाव कमेंट के माध्यम से सादर आमंत्रित हैं.

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