मोहिनी एकादशी व्रत कथा क्या है ?

मोहिनी एकादशी व्रत कथा

मोहिनी एकादशी व्रत कथा

वैशाख मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है.मोहिनी एकादशी व्रत कथा के श्रवण से बड़े से बड़े पाप नष्ठ हो जाते है.मोहिनी एकादशी व्रत कथा रखने से मोहजाल से मुक्ति मिलती है.

मोहिनी एकादशी व्रत कथा की शुरुआत

मोहिनी एकादशी व्रत कथा प्राचीन समय में सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नाम की एक नगरी बसी हुई थी.उस नगरी में द्युतिमान नामक राजा राज्य करता था.उसी नगरी में एक वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से पूर्ण था.उसका नाम धनपाल था.वह अत्यन्त धर्मात्मा तथा नारायण-भक्त था उसने नगर में अनेक भोजनालय, प्याऊ, कुएँ, तालाब, धर्मशालाएं आदि बनवाये, सड़को के किनारे आम, जामुन, नीम आदि के वृक्ष लगवाए, जिससे पथिकों को सुख मिले.

धनपाल के पाँच पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़ा पुत्र अत्यन्त पापी व दुष्ट था.वह परस्त्रियो और दुष्टों की संगति करता था. इससे जो समय बचता था, उसे वह जुआ खेलने में व्यतीत करता था.वह बड़ा ही अधम था और देवता, पितृ आदि किसी को भी नहीं मानता था.अपने पिता का अधिकांश धन वह बुरे व्यसनों में ही उड़ाया करता था.मद्यपान तथा मांस का भक्षण करना उसका नित्य कर्म था.जब काफी समझाने-बुझाने पर भी वह सीधे रास्ते पर नहीं आया तो दुखी होकर उसके पिता, भाइयों तथा कुटुम्बियों ने उसे घर से निकाल दिया और उसकी निन्दा करने लगे.

घर से निकलने के बाद वह अपने आभूषणों तथा वस्त्रों को बेच-बेचकर अपना गुजारा करने लगा.धन नष्ट हो जाने पर परस्त्रियो तथा उसके दुष्ट साथियों ने भी उसका साथ छोड़ दिया.जब वह भूख-प्यास से व्यथित हो गया तो उसने चोरी करने का विचार किया और रात्रि में चोरी करके अपना पेट पालने लगा, लेकिन एक दिन वह पकड़ा गया, किन्तु सिपाहियों ने वैश्य का पुत्र जानकर छोड़ दिया.जब वह दूसरी बार पुनः पकड़ा गया, तब सिपाहियों ने भी उसका कोई लिहाज नहीं किया और राजा के सामने प्रस्तुत करके उसे सारी बात बताई.तब राजा ने उसे कारागार में डलवा दिया. कारागार में राजा के आदेश से उसे बहुत कष्ट दिए गये और अन्त में उसे नगर छोड़ने के लिए कहा गया.दुखी होकर उसे नगर छोड़ना पड़ा.


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अब वह जंगल में पशु-पक्षियों को मारकर पेट भरने लगा.फिर बहेलिया बन गया और धनुष-बाण से जंगल के निरीह जीवों को मार-मारकर खाने और बेचने लगा. एक बार वह भूख और प्यास से व्याकुल होकर भोजन की खोज में निकला और कौटिन्य मुनि के आश्रम में जा पहुँचा.इन दिनों वैशाख का महीना था.कौटिन्य मुनि गंगा स्नान करके आये थे.उनके भीगे वस्त्रों की छींटें मात्र से इस पापी को कुछ सद्बुद्धि प्राप्त हुई. वह अधम, ऋषि के पास जाकर हाथ जोड़कर कहने लगा-

“हे महात्मा! मैंने अपने जीवन में अनेक पाप किये हैं, कृपा कर आप उन पापों से छूटने का कोई साधारण और बिना धन का उपाय बतलाइये.”

ऋषि ने कहा- “तू ध्यान देकर सुन- वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत कर.इस एकादशी का नाम मोहिनी है.इसका उपवास करने से तेरे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे.”

ऋषि के वचनों को सुन वह बहुत प्रसन्न हुआ और उनकी बतलायी हुई विधि के अनुसार उसने मोहिनी एकादशी व्रत किया.इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गये और अन्त में वह गरुड़ पर सवार हो विष्णुलोक को गया.

●◆ मोहिनी एकादशी व्रत कथा संपन्न ◆●

नोट:- हमें उम्मीद है आपको अपने सवाल “मोहिनी एकादशी व्रत कथा क्या है” का जवाब मिल गया होगा.इस आर्टिकल में लिखी गयी सभी जानकारी को लिखनें मे बेहद सावधानी बरती गयी है.फिर भी किसी भी प्रकार त्रुटि की संभावना से इनकार नही किया जा सकता.इसके लिए आपके सुझाव कमेंट के माध्यम से सादर आमंत्रित हैं.

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