षटतिला एकादशी व्रत कथा क्या है ?

षटतिला एकादशी व्रत कथा

षटतिला एकादशी व्रत कथा

षटतिला एकादशी व्रत कथा सुनने और इसके पालन से अनजाने में हुए सभी पाप मिट जाते है.षटतिला एकादशी करने वाले को भगवान सभी अपराधों से मुक्त कर देते हैं.इस दिन तिल से स्नान और तिल दान करने का महत्व है.मान्यताओं के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति जितने तिलों का दान करता है उसे उतने ही हजार साल स्वर्ग में रहने का अवसर मिलता है.

इस बार षटतिला एकादशी 31 जनवरी 2019 को गुरुवार के दिन है

षटतिला एकादशी व्रत कथा की शुरुआत

हिंदु धार्मिक ग्रंथों के अनुसार एक बार देवर्षि नारद त्रिलोक भ्रमण करने के पश्चात वैकुण्ठ धाम भगवान श्री हरि विष्णु के निकट पहुंचे.वैकुण्ठ धाम में देवर्षि नारद ने भगवान श्री हरि विष्णु तथा माँ महालक्ष्मी को अभिवादन किया तथा जिज्ञासा व्यक्त करते हुए प्रश्न किया

नारद मुनि :- “हे प्रभु! षट्तिला एकादशी व्रत क्या है?कृपा करके इस व्रत के महत्व और पूजन विधि के बारे में बताएं.एवम इस व्रत को करने से कैसा फल और पुण्य प्राप्त होता है?कृपा करके बताएं.”

देवर्षि नारद द्वारा विनीत भाव से किये गए प्रश्न पर भगवान श्री हरि विष्णु जी ने कहा

भगवान विष्णु:- “हे नारदमुनि!अब में जो कथा बताने जा रहा हु उसे श्राद्धपूर्वक श्रवण करे.”

षटतिला एकादशी व्रत कथा

षटतिला एकादशी व्रत कथा

एक समय की बात है जब पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी रहती थी.ब्राह्मणी मेरी पूजा और भक्ति किया करती थी और मेरे नाम से प्रत्येक व्रत को किया करती थी.एक बार उसने भक्ति भाव से एक माह तक कठिन व्रत किया.व्रत के प्रभाव से ब्राह्मणी का शरीर तो शुद्ध हो गया.परन्तु ब्राह्मणी नारी कभी अन्न-दान नही किया करती थी.जिस कारण ब्राह्मणी वैकुण्ठ धाम में भी अतृप्त रहती.ब्राह्मणी नारी के मनसंशय को दूर करने के लिए मैं स्वयं ब्राह्मणी नारी के आश्रम जा पंहुचा.ब्राह्मणी नारी से जब भिक्षा की याचना कि तब ब्राह्मणी नारी ने मिटटी का एक छोटा सा टुकड़ा मेरे हाथो पर भिक्षा के रूप में दिया. जिसे लेकर मैं वैकुण्ठ धाम लौट आया.

कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी नारी ने शरीर को त्याग दिया.जब वह वैकुण्ठ धाम आई तब उसे एक खाली आश्रम और आम का एक वृक्ष मिला.इसे देख ब्राह्मणी नारी घबराकर मेरे पास आयी और बोली,”प्रभु मैंने तो सभी व्रत पूर्ण किए. धर्म का पालन किया. फिर मुझे केवल एक वृक्ष और खाली आश्रम क्यों मिला?


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ब्रम्हाणी के सवाल पर मैंने उसे बताया हे ब्राह्मणी तुमने मेरी भक्ति को किया परन्तु अन्न-दान कभी नही किया. तथा जब मैं स्वंय तुम्हारे पास भिक्षा याचना के लिए आया तब तुमने केवल मिटटी का छोटा सा टुकड़ा प्रदान किया था.तब उस ब्रम्हाणी नारी को अपने गलती का अहसास हुआ.

ब्राह्मणी नारी ने मुझसे पूछा “हे प्रभु !इस संकट से कैसे मुक्ति मिलेगी?

तब मैंने कहा ब्राह्मणी अबसे कुछ देर बाद देव कन्याए तुम्हारे आश्रम में आएगी.जब देव कन्याएँ तुमसे मिलने आएं उस वक्त आश्रम का द्वार खोलना और उनके बताये गए षट्तिला एकादशी व्रत को विधि- विधान से करना.

भगवान विष्णु जी के वचनो को पालन करते हुए ब्राह्मणी ने उन देवकन्या से षट्तिला एकादशी के बारे में पूछा तथा उनके बताये गए निर्देशो के अनुसार षट्तिला एकादशी का व्रत किया.जिससे ब्राह्मणी का आश्रम अन्न से भर गया.

इतना बताकर भगवान विष्णु ने नारदमुनि से कहा “हे मुनिवर! इस बात को ध्रुव सत्य मानो की जो व्यक्ति इस एकादशी व्रत को विधि -विधान से करता है उसे वैभव और मुक्ति की प्राप्ति होती है.”

नोट:- हमें उम्मीद है आपको अपने सवाल “षटतिला एकादशी व्रत कथा क्या है” का जवाब मिल गया होगा.इस आर्टिकल में लिखी गयी सभी जानकारी को लिखनें मे बेहद सावधानी बरती गयी है.फिर भी किसी भी प्रकार त्रुटि की संभावना से इनकार नही किया जा सकता.इसके लिए आपके सुझाव कमेंट के माध्यम से सादर आमंत्रित हैं.

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