संभाजी महाराज की हत्या कैसे हुयी ?

संभाजी महाराज की हत्या

संभाजी महाराज की हत्या

संभाजी महाराज की हत्या हिंदवी साम्राज्य में एक काला धब्बा साबित हुयी.इतनी बरबरता के साथ हुयी हत्या के कारण मराठा साम्राज्य हिल गया.लेकिन साथ ही अपने राजा के क्रूर हत्या का बदला लेने के लिए सारे सरदार एक हो गए.आनेवाले कई सालों तक उन्होंने बादशाह औरंगज़ेब को परेशान किया.दक्षिण विजय का सपना देखने वाले बादशाह औरंगज़ेब का सपना सपना ही रह गया. बादशाह औरंगज़ेब को दक्षिण में ही अपनी जान गवानी पडी.

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1 फरवरी 1689 को संभाजी राजे ने संगमेश्वर में एक गुप्त सभा बुलाई थी.इस सभा में केवल महत्वपूर्ण लोIग शामिल होने वाले थे.इसलिए संभाजीराजे अपने साथ केवल 200-300 सैनिक लेकर संगमेश्वर गए थे. संगमेश्वर कोकण प्रांत में बसा था.संभाजीराजे को यकीन था की, मुघलो को उनकी इस सभा के बारे में कभी पता नही चल सकता था और नाही मुग़लों को संगमेश्वर आने का गुप्त रास्ता पता था.संभाजीराजे का यह सोचना लाजमी था.क्योंकि संगमेश्वर पहुचना इतना आसान नही था. मैदानी इलाकों में युद्ध करने वाले मुघल सैनिकों के लिए पहाड़ो और जंगलों में किसी भी युद्ध को जित पाना नामुमकिन था.लेकिन यहाँ पर संभाजीराजे को यह नही पता था की उनके बहनोई गणोजी शिर्के ने उनके साथ गद्दारी की है.

गणोजी शिर्के संभाजीराजे की पत्नी येसुबाई के सगे भाई थे.गणोजी शिर्के चाहते थे की संभाजीराजे राजे उनको वतनदारी बहाल करे.लेकिन शिवाजी महाराज ने अपने कार्यकाल में वतनदारी की प्रथा बंद की थी.और संभाजी महाराज चाहते थे की उनके पिता द्वारा चलायी गई यह प्रथा आगे कायम रहे. इसलिए संभाजीराजे ने गणोजी को वतनदारी देने से इंकार कर दिया.वतनदारी का मतलब किसी व्यक्ति को बक्षीस के तौर पर कुछ गांव या प्रांत दे देना होता था.यानि एकबार किसीको वतनदारी मिल जाए तो वह व्यक्ति उन गांवो का राजा बन जाता था.उस गांव से मिलनेवाला टैक्स उस व्यक्ति को मिलता था.

संभाजी महाराज की हत्या – सगे बहनोई ने की गद्दारी

संभाजी महाराज की हत्या
कैदी संभाजी महाराज का काल्पनिक चित्र

वतनदारी ना मिलने की वजह से नाराज गणोजी शिर्के ने संभाजीराजे के खिलाफ गद्दारी की.गणोजी ने संगमेश्वर में होनेवाली गुप्त सभा के बारे में औरंगज़ेब को बताया.साथ ही गणोजीने संगमेश्वर पहुचने का गुप्त रास्ता औरंगज़ेब को बताया.औरंगज़ेब ने अपने खास सरदार मुक़र्रबखान को संगमेश्वर जाने का आदेश दिया. संभाजीराजे के पराक्रम से परिचित मुक़र्रबखान ने अपने साथ 3000 से 5000 हजार की विशाल सेना ली.मुक़र्रबखान ने अपनी आधी सेना को संभाजीराजे के ऊपर हमला करने का आदेश दिया और खुद बाकी सैनिकों के साथ संभाजीराजे को चारों तरफ से घेर लिया.अचानक हुए हमले की वजह से मराठा सैनिक चौंक गए.उन्होंने मुक़र्रबखान की विशाल सेना का प्रतिकार किया.

मराठो और मुघल सैनिको के बिच घमासान युद्ध हुआ.विशाल मुघल सेना के सामने मराठा सैनिको को पीछे हटना पड़ा. संभाजीराजे समेत कई मराठा सैनिकों ने वहासे निकलने की कोशिश की. संभाजीराजे नदी के रास्ते से वहा से निकलने की फिराक में थे.लेकिन मुक़र्रबखान पहलेसे ही वहा तैनात था.मुक़र्रबखानने संभाजीराजे और उनके करीबी दोस्त एवं मंत्री कवी कलश को कैद कर लिया.

संभाजी महाराज की हत्या – संभाजीराजे का सर मुंढवाया

संभाजी महाराज की हत्या
मराठा सैनिक का काल्पनिक चित्र

संभाजीराजे को कैद करते ही मुक़र्रबखान ने संभाजीराजे के बाल और दाढ़ी को निकलवा दिया.वो चाहता था की कोई संभाजीराजे को पहचान न सके.मुक़र्रबखान जानता था की,उसके सनमेश्वर में रहते अगर मराठो को इस बात की खबर चलती तो वे किसी भी कीमत पर संभाजीराजे को छुड़ा लेते.इस बात से ख़ौफ़ज़दा मुक़र्रबखान बड़ी तेजी के साथ संभाजीराजे को बहादुरगढ़ ले आया.

संभाजीराजे और कवी कलश के कैद की खबर मराठाओ पता चल गयी.संभाजीराजे ने नियम बना रखा था की, एक इंसान की जान बचाने के लिए मराठा अपने हजारों सैनिको की जान दांव पर नही लगायेंगे.इसी नियम के चलते ना चाहते हुए मराठा सरदार अपने राजा को छुड़ाने के लिए कुछ नही कर सकते थे. संभाजीराजे के नियम के खिलाफ जाकर उनके कई सैनिकों ने उनको छुड़ाने की कोशिश की.लेकिन बादशाह के विशाल सेना के सामने कोई टिक न सका. सब को अपनी जान गवानी पड़ी.बादशाह औरंगज़ेब ने अपनी पूर्ण ताकत संभाजीराजे को बंदी बनाकर रखने में लगा दी थी.मराठा सरदार चाहते भी तो संभाजीराजे को कैद से आजाद कराना तकरीबन नामुमकिन था.

संभाजी महाराज की हत्या – संभाजीराजे को कैदी बनाकर खुश था बादशाह औरंगज़ेब

संभाजीराजे को बहादुरगढ़ में बंदी बनाने के बाद बादशाह औरंगज़ेब बेहद खुश था.औरंगज़ेब किसी तरह से दक्षिण पर विजय पाना चाहता था.इसके लिए वह मराठा साम्राज्य अपने अधीन करना चाहता था.मराठा साम्राज्य का छत्रपति को कैद करना यह अपनेआप में बेहद बड़ी बात थी.बादशाह औरंगज़ेब ने संभाजीराजे को धर्म बदलकर मुग़ल सल्तनत का हिस्सा बनने के लिए कहा.संभाजीराजे ने इस बात से इनकार कर दिया.इस बात से खफा बादशाह औरंगज़ेब ने संभाजीराजे को हलाल करने का आदेश दिया.इसके लिए तुलापुर किल्ले की जगह तय की गयी.

संभाजी महाराज की हत्या – संभाजी राजे को सहना पडा घोर अपमान

बादशाह के आदेश के बाद संभाजीराजे के साथ बेहद क्रूर बर्ताव किया गया.संभाजीराजे और कवी कलश को बहादुरगढ़ से तुलापुर ले जाया गया.इस रास्ते से ले जाते वक़्त चारो तरफ मुघल सैनिकों का सख्त पहरा था. रास्ते के दोनों तरफ बादशाह को मानाने वाले लोग (मुस्लिम) थे.संभाजीराजे और कवी कलश के राजवस्त्र निकालकर उन्हें गंदे बोरिया पहनाई गयी.कुरान में लिखी सजा की तरह संभाजीराजे और कवी कलश को इराणी टोपियां पहनाई गयी.उनके कंधो पर भारी भरकम लकड़ी “तख्तेकुलाह” लगायी गयी.दोनों को बिमार ऊंट पर उल्टा लटकाया गया.रास्ते के दोनों तरफ मौजूद बादशाह के लोगों (मुस्लिम) ने “दिन दिन” और “अल्ला हु अकबर” के नारे लगाते हुए संभाजीराजे और कवी कलश पर पत्थर बरसाए.खून से लथपथ संभाजीराजे और कवी कलश को तुलापुर लाया गया.इसी हालत में दोनों को किल्ले के गंदे तहखाने में बंद किया गया.

संभाजी महाराज की हत्या – संभाजीराजे ने नही छोडा हिंदु धर्म

इतने बुरे बर्ताव के बाद शायद संभाजीराजेने अपनी सोच बदली होगी.यह सोचकर बादशाह औरंगज़ेबने फिर एकबार संभाजीराजे को अपना धर्म बदल मुघल साम्राज्य में शामिल होने को कहा. संभाजीराजे ने इससे इनकार कर दिया.इस बात से बादशाह औरंगज़ेब बेहद क्रोधित हो उठा.बादशाह ने पहले कवी कलश और बादमे संभाजीराजे की जुबान काटने का आदेश दिया.बादशाह चाहता था की,संभाजीराजे अपने प्रिय दोस्त को तड़पते हुए देखे. सैनिको ने बादशाह के आदेश का पालन किया.

संभाजीराजे के आँखो के सामने कवी कलश की जुबान काट दी गयी.अपने आँखो के सामने दर्द से तड़पते अपने प्रिय दोस्त को संभाजीराजे बेबसी से देखते रहे.वह चाहकर भी कुछ न कर सकते थे.थोड़ी देर बाद कवी कलश बेहोश हो गए.इसके बाद सैनिक संभाजीराजे की और बड़े. संभाजीराजे को पता चल चूका था की अब उनकी जबान काटी जायेगी.उन्होंने अपना मुँह बंद कर लिया.दो- चार मुघल सैनिकोंने संभाजीराजे को बेहरमी से निचे दबाया और जबरदस्ती उनका मुँह खुलवाने की कोशिश करने लगे लेकिन संभाजीराजे टस से मस नही हुए.संभाजीराजे ने अपना मुह नही खोला.संभाजीराजे का मुँह खुलवाने में असमर्थ सैनिकों ने गुस्से में संभाजीराजे को बुरी तरह पीटा. फिर भी संभाजीराजे ने अपना मुह नही खोला.फिर कुछ सैनिको ने संभाजीराजे को बेरहमी से पकड़कर उनका नाक दबाया.कुछ देर बाद सास लेने में दिक्कत होने की वजह से विवश होकर संभाजीराजे ने अपना मुह खोला. बस इतने वक़्त में ही सैनिको ने बेरहमी से उनकी जबान खीच कर तलवार से काट दी.जबान कटने के बाद बेतहाशा दर्द से संभाजीराजे तड़पते रहे.लेकिन किसी को उनकी जरासी भी दया नही आयी.संभाजीराजे को दर्द से तड़पते देख मुघल सैनिक हसते और उन्हें पत्थर मारते थे.

करीब 40 दिनों तक यह क्रूर सिलसिला जारी रहा. वहा बादशाह औरंगज़ेब का हुक्म होता और यहाँ सैनिक संभाजीराजे और कवी कलश के साथ क्रूरता करने में कोई कसर नही छोड़ते.बादशाह जो भी आदेश देता उसको पहले कवी कलश पर आजमाया जाता और बादमे संभाजीराजे पर.बादशाह औरंगज़ेब चाहता था की संभाजीराजे जान ले की अगले पल उसके साथ क्या होनेवाला है.

संभाजी महाराज की हत्या – कवी कलश ने छोड़ा संभाजीराजे का साथ

संभाजी महाराज की हत्या
संभाजीराजे के प्रिय दोस्त कवी कलश की समाधी

जुबान काटने के बाद बादशाह ने दोनों के कान में खौलता शीशा डालने का हुक्म दिया.हुक्म का इंतजार कर रहे सैनिको ने आदेश का पालन करने में कोई कसर नही छोड़ी.बादशाह के हुक्म के अनुसार संभाजीराजे के सामने पहले कवी कलश के कानो में खौलता शीशा डाला गया.बादमे संभाजीराजे के कानो में भी शीशा डाला गया.जुबान कटी होने की वजह से अब उनके मुह से केवल दर्द से मिनमिनाने की आवाज आती थी.इसी आवाज को सुनकर मुघल सैनिक उनके मिनमिनाने की नक़ल करते और हसते.

हरदिन बादशाह का नया फरमान आता और सैनिक उस पर अमल करते. इसके बाद संभाजीराजे की आँखे निकालने का हुक्म आया.और हमेशा की तरह पहले कवी कलश की आँखे निकाली गयी.उसके बाद संभाजीराजे के आँखों में लोहे की गरम सलिया डाली गयी.लोहे की तपती सलिया आखो में जाते ही आँखो में चरर् चरर की आवाज आयी और आँखो का पानी और खून दोनों जल गए.दर्द से तड़पते दोनो को उसी हालात में छोड़ सैनिक हसते रहे. बादशाह के आदेश ने क्रूरता की हदों को तोड़ दिया था.

इतिहास में एक राजा का इतना घोर अपमान किसी दूसरे राजा ने कभी नही किया था.इतनी क्रूर सजा मिलने के बाद कवी कलश की जान चली गयी.

संभाजी महाराज की हत्या – गुढीपाडवा के दिन हुयी संभाजी महाराज की हत्या

संभाजी महाराज की हत्या
संभाजी महाराज की समाधी

कवी कलश की मृत्यु के बाद संभाजीराजे के साथ हो रही बर्बरता कम नही हुयी.हरदिन सैनिक आते और संभाजीराजे पर नमक का पानी डालते.कोई सैनिक आता और नाख़ून उखाड़ लेता,दुसरा आता और उनकी खाल छिल डालता. कोई उनके उंगलिया काटता तो कोई नाक.इतनी क्रूरता के बाद भी संभाजी राजे मौत से जंग लढते रहे.संभाजी राजे को बेखौफ देख औरंगज़ेब ने उनको हलाल करने का आदेश दिया.इसके लिए बादशाह ने हिंदु नववर्ष यानी “गुढीपाडवा” का दिन चुना.बादशाह चाहता था की हिंदु अपने राजा को उनके सबसे पवित्र दिन मरता हुआ देखे.

11 मार्च 1689 यानी गुढीपाडवा के दिन संभाजीराजे की इंद्रायणी नदी के किनारे टुकड़े टुकड़े कर हत्या करवा दी.बादशाह ने आदेश दिया की संभाजीराजे के शरीर के तूकड़ो को कोई नही छुएगा.और यदि कोई ऐसा करता है तो उसको भी मौत की सजा दी जायेगी.हिंदवी स्वराज्य के छत्रपति के टुकड़े नदी किनारे पड़े रहे लेकिन बादशाह के डर से किसीने उन्हें नही छुआ.

इतिहास में लिखा हुआ मिलता है.गोविंदा नाम के महांर जाती के शख्स ने बादशाह के धमकी की परवाह किए बिना संभाजीराजे के शरीर के टुकड़े रात के अँधेरे में इकठा किए. बादमे उसे सुईधागे से सिया.इस बात की खबर गाव के मुखिया को लगी तब उसने गोविंदा को ऐसा ना करने की सलाह दी.गोविंदा ने किसी बात की परवाह किए बिना अपने खेत में संभाजीराजे का दाह संस्कार किया.इतने दुखद अंत के बाद भी संभाजीराजे इतिहास में अमर हो गए.

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