होलिका कौन थी ?Holika kaun thi ?

Holika kaun thi

होलिका कौन थी ? – Holika kaun thi ?

Holika kaun thi – होलिका असुर राजा हिरण्यकश्यप की बहन थी.हिंदु मान्यताओं के अनुसार होलिका का जन्म जनपद कासगंज के सोरोंशूकर क्षेत्र नाम के जगह पर हुआ था.होलिका के पति का नाम “इलोजी” बताया जाता है. हालाकि दोनो की शादी नही हुयी थी.शादी के दिन ही होलिका की जलकर मृत्यु हो गयी थी.

हिरण्यकश्यप की कहानी – Holika kaun thi ?

Holika kaun thi in hindi
असुर राजा हिरण्यकश्यप और बालक प्रल्हाद

भागवत पुराण के अनुसार दैत्यों के राजा हिरण्यकश्यप ने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कड़ी तपस्या की.हिरण्यकश्यप की तपस्या से देवता प्रसन्न हुए और हिरण्यकश्यप से वरदान मागने के लिए कहा.हिरण्यकश्यप ने वरदान के तौर पर अमर होने का वचन माँगा.देवताओं ने हिरण्यकश्यप के इस वरदान को उचित नही समझा और उसे दुसरा वरदान माँगने के लिए कहा.मनचाहा वरदान न मिलता देख हिरण्यकश्यप ने चतुराई दिखाई और देवताओं से ऐसा वरदान माँग की वह तकरीबन अमर हो गया.हिरण्यकश्यप ने वरदान के तौर पर देवताओं से प्रार्थना की.हिरण्यकश्यप ने माँगा की,उसको पृथ्वी का कोई जिव नही मार सके.मानव, प्राणी, किट, जंतु, देवी,देवता, राक्षस इनमेसे कोई भी उसे मार न सके. देवताओं ने हिरण्यकश्यप की यह बात मान ली और उसे वरदान दे दिया.

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इस वरदान के चलते हिरण्यकश्यप तकरीबन अमर हो गया था.मानव, प्राणी, किट,जंतु, देवी,देवता और राक्षस से उसे भय नही रहा.हिरण्यकश्यप अहंकारी और अत्याचारी हो गया.उसने देवताओं का नाश करने की ठान ली थी.हिरण्यकश्यप ने आदेश दिया की,समस्त पृथ्वी पर कोई भी देवताओं की पूजा नही करेगा.हिरण्यकश्यप की डर से सब लोगों ने देवताओं की पूजा करनी बंद कर दी.लेकिन हिरण्यकश्यप का खुदका बेटा प्रल्हाद भगवान विष्णु का परम भक्त था.भगवान विष्णु भी प्रल्हाद की भक्ति से खुश थे और प्रल्हाद की रक्षा करते थे.पिता के आदेश के बावजूद प्रल्हाद दिनरात भगवान विष्णु की पूजा करता था.

अपने बेटे की यह हरकत हिरण्यकश्यप को पसंद नही आयी.उसने कई बार प्रल्हाद को समझाने की कोशिश की लेकिन प्रल्हाद ने विष्णु की पूजा करना बंद नही किया.इस बात से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने कई बार प्रल्हाद को मारने की कोशिश की. लेकिन हर बार भगवान विष्णु प्रल्हाद को बचा लेते.

होलिका दहन की कहानी -Holika kaun thi ?

Holika kaun thi
होलिका दहन की कहानी

पिता के आदेश के बावजूद प्रल्हाद ने भगवान की पूजा करना जारी रखा.प्रल्हाद को अपने आदेश का भंग करता देख हिरण्यकश्यप क्रोधित हो उठा.हिरण कश्यप ने प्रल्हाद को मारने के लिए अनेक उपाय किए. परंतु हिरण्यकश्यप का हर प्रयास विफल हो जाता था.इस बात से चिंतित हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया.

होलिका अग्नि की उपासक थी.होलिका को आग में न जलने का वरदान मिला था.हिरण्यकश्यप को होलिका के इस वरदान के बारे में पता था.इसलिए हिरण्यकश्यप ने होलिका को आदेश दिया की,वह प्रल्हाद को अपने गोदी में बिठाकर अग्नि में प्रवेश करे और प्रल्हाद को जलाकर मार दे.होलिका को हिरण्यकश्यप की यह योजना पसंद आयी.वह जानती थी की अग्नि उसका कुछ नही बिगाड़ सकती.

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हिरण्यकश्यप और होलिका की इस योजना को फाल्गुन पूर्णिमा की रात में अंजाम दिया गया.राज्य के बीचोबीच बड़ी चिता रची गयी.होलिका प्रल्हाद को अपनी गोदी में उठाकर चिता पर बैठ गयी.होलिका और प्रल्हाद के बैठने के बाद चिता में आग लगायी गयी.आग की लपटो ने चिता को घेर लिया.आग को देखकर हिरण्यकश्यप खुश हो उठा.वह जानता था की अब प्रल्हाद का बचना मुश्किल है.लेकिन हुआ इसके उलटा.अपने आप को आग से घिरा देख बालक प्रल्हाद मन ही मन भगवान विष्णु को स्मरण करने लगा.

अपने भक्त को संकट में देख भगवान विष्णु प्रल्हाद को बचाने आये.भगवान विष्णु ने प्रल्हाद के शरीर को आग से बचा लिया.होलिका को उसके घमंड का सबक मिला और आग में न जलने का वरदान होने के बावजूद वह खुदके घमंड के आग में जलकर मर गयी. दरअसल होलिका भूल गई थी कि वरदान उसके सुरक्षा के लिए था, ना कि किसी और के साथ कपट करने के लिए.होलिका के कपट और घमंड ने उसे भस्म कर दिया.और बालक प्रल्हाद अपने भक्ति और सच्चाई के कारण सही सलामत बच गया.

भागवत पुराण के अनुसार जिस रात यह घटना हुयी वह फाल्गुन पूर्णिमा की रात थी.इसलिए तबसे अच्छाई की बुराई पर जितके प्रतिक के तौर पर हर साल फाल्गुनी पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है.

होलिका और उसके पति इलोजी की प्रेम कहानी -Holika kaun thi ?

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इलोजी और होलिका की प्रतीकात्मक तस्वीरे

होलिका से संबंधित और कई कहानिया प्रचलित है.होलिका और इलोजी की प्रेम कहानी भी लोककथाओं में मिलती है.यह कहानी कुछ ऐसी है:-

होलीका इलोजी नाम के राजकुमार से बेहद प्यार करती थी.दोनों की शादी होनेवाली थी.दोनों का विवाह फाल्गुन पूर्णिमा को तय हो चुका था.होलिका का भाई असुर राजा हिरण्यकश्यप अपने बेटे प्रल्हाद की विष्णु भक्ति से परेशांन था.हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे को मौत के घाट उतारने की ठान ली थी.उसने कई बार प्रल्हाद को मारने की कोशिश की लेकिन हर बार वह विफल रहा.

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प्रल्हाद से परेशान हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को कहा कि, वह प्रल्हाद को अपनी गोद में लेकर अग्निकुंड में बैठ जाए.क्योंकि होलीका अग्नि की उपासक थी इसलिए उसे आग में न जलने का वरदान मिला हुआ था. परंतु होलीका ने ऐसा करने से मना करा दिया.होलिका के इंकार को सुनकर हिरण्यकश्यप क्रोधित हो गया.उसने होलिका और इलोजी की शादी में बाधा डालने की धमकी दी. हिरण्यकश्यप की धमकी से होलीका डर गई और वह प्रल्हाद को गोदी में लेकर अग्निकुंड में बैठने को तैयार हो गई.अपनी भक्ति के वजह से प्रल्हाद अग्नि से बच गए लेकिन होली क स्वयं जलकर खाक हो गई.

जिस रात यह घटना घटी वह फाल्गुन पूर्णिमा की रात थी. और इसके अगले दिन होलिका और एलोजी की शादी होनी थी.इस घटना से बेखबर इलोजी धूमधाम से अपनी बारात लेकर आ रहा था.बाराती आनंद से एक दूसरे को रंग लगाते हुए आ रहे थे.जब इलोजी बारात लेकर पहुंचा तो उसे सिर्फ होलिका की राख मिली. वह यह दुःख बर्दाश्त ना कर सका और पागल हो गया.इस पागलपन और सदमे में इलोजी का अंत हो गया.आज भी भारत के कुछ शहरों में इलोजी की बारात की याद में लोग रातभर रंगो से खेलते है.

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