Mahabhiyog kya hai – महाभियोग प्रस्ताव क्या है?

Mahabhiyog kya hai

Mahabhiyog kya hai – महाभियोग प्रस्ताव क्या है

Mahabhiyog kya hai – महाभियोग एक न्यायिक प्रक्रिया है.इस प्रक्रिया को कुछ विशेष पदों पर आसीन व्यक्तियों के संविधान के उल्लंघन का आरोप लगने पर चलाया जाता हैं. इन पदों में राष्ट्रपति सुप्रीम और हाईकोर्ट के जज और भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त शामिल हैं.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार महाभियोग की प्रक्रिया राष्ट्रपति को हटाने के लिए उपयोग में की जाती है. संविधान के अनुच्छेद 124 और 124 (4) में न्यायाधीश को हटाने का प्रावधान है. मतलब जजों को हटाने का प्रावधान है. इसके तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज पर अक्षमता और कदाचार यानि मिस बिहेवियर के लिए महाभियोग का प्रस्ताव लाया जा सकता है. संसदीय न्यायाधीश को हटाने के लिए संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाना जरूरी होता है.महाभियोग के जरिए जजों को हटाने की जो प्रक्रिया है उसमें जजेज इंक्वायरी एक्ट 1968 शामिल है.

Mahabhiyog kya hai – महाभियोग प्रस्ताव की प्रक्रिया

महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है तो लोकसभा के कम से कम 100 सांसद के हस्ताक्षर और राज्यसभा के कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर होना जरुरी है. इस प्रस्ताव को संसद में पेश करने के लिए लोकसभा में अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति की मंजूरी लेना आवश्यक है. अगर प्रस्ताव खारिज हो जाता है तो महाभियोग की प्रक्रिया फिर से शुरू करनी होती है. लेकिन अगर लोकसभा या राज्यसभा में प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो जजेज इंक्वायरी एक्ट 1968 के तहत जांच के लिए कमेटी बनाई जाती है. यह कमेटी तीन सदस्यों की होती है. इसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जस्टिस, देशभर के हाई कोर्ट में से कोई एक चीफ जस्टिस और एक जानकार होता है. यह जानकार यह तो बड़ा वकील हो सकता है या रिसर्च स्कॉलर हो सकता है.यह संविधान विशेषज्ञ हो भी सकता है. जांच के लिए कमेटी को 3 महीने का वक्त मिलता है. हलाकि जरूरत पड़ने इस टाइम लिमिट को बढ़ाया जा सकता है. जिस सदन में महाभियोग के प्रस्ताव की शुरुआत की गई थी उस सदन में जांच की रिपोर्ट रखी जाती है.अगर दोषी पाए गए तो इसके बाद सदन अपनी सहमति रखता है और इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है.लेकिन इससे पहले जिस व्यक्ति पर महाभियोग की प्रक्रिया चल रही होती है वह सदन में उपस्थित होकर अपना पक्ष रख सकता है.हालांकि अंतिम निर्णय सदन के पास ही होता है.अगर दोनों सदन यानी लोकसभा और राज्यसभा इस महाभियोग प्रस्ताव को दो तिहाई बहुमत से पास कर देते हैं,तो उसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है.अगर राष्ट्रपति जज को हटाने की अपनी मंजूरी दे देते हैं यानी हस्ताक्षर कर देते हैं,तो उसके बाद जज अपने पद पर नहीं बने रह सकते हैं.इस पूरे प्रक्रिया में महाभियोग प्रस्ताव ख़ारिज होने के संभावना होती है. तो यह सवाल उठता है कि महाभियोग की प्रक्रिया इतनी जटिल क्यों है.

Mahabhiyog kya hai – क्यों जटिल है महाभियोग प्रक्रिया

संविधान निर्माताओं ने यह प्रक्रिया इसलिए जटिल बनाई है क्योंकी इन पदों पर बैठे लोग खुलेपन और निष्पक्षता से काम कर सकें. साथ ही बहुमत होने पर कोई भी सरकार कोर्ट को अपने हाथ में ना ले सके. जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को हटाने की प्रक्रिया है.वही प्रक्रिया हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को हटाने की भी है.

Mahabhiyog kya hai – भारत में महाभियोग का इतिहास क्या है

हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जा चुका है.हालांकि सुप्रीम कोर्ट के किसी भी जज के खिलाफ अब तक महाभियोग प्रस्ताव नहीं आया है.

Mahabhiyog kya hai – हाइकोर्ट से जुड़े महाभियोग

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वी. रामास्वामी

जस्टिस वी. रामास्वामी पहले चीफ जस्टिस थे जिनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था. वह पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे. साल 1991 में उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे. इसके अलावा उनकी नियुक्ति में भी गड़बड़ी की बात सामने आई थी. महाभियोग आने के बाद जज इंक्वायरी एक्ट 1968 के तहत जांच कमेटी बनाई गयी. इस जांच कमेटी ने जस्टिस वी. रामास्वामी को दोषी पाया था. इस मुद्दे पर लोकसभा में करीब चार-पांच घंटे की सुनवाई हुई थी. उस वक़्त जस्टिस वी. रामास्वामी नहीं आए थे. उनकी जगह उनके वकील कपिल सिब्बल जस्टिस वी. रामास्वामी की तरफ से वकील के रूप में पेश हुए थे. इस महाभियोग प्रस्ताव पर लोकसभा में वोटिंग हुई थी. लेकिन प्रस्ताव के पक्ष में दो तिहाई बहुमत नहीं मिला. इसकी वजह से महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो सका. हालांकि जस्टिस वी. रामास्वामी ने इसके बाद ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.

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पी. डी. दिनकरन

साल 2011 में सिक्किम हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस पी. डी. दिनकरन के खिलाफ राज्यसभा के सांसदों ने राज्यसभा के तत्कालीन सभापति हामिद अंसारी को पत्र लिखा था.सांसदों ने उन पर 16 आरोप लगाए थे. उनके खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी हुई थी. सभापति ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन भी कर दिया था. लेकिन सुनवाई के कुछ दिन पहले ही जस्टिस दिनकरन ने इस्तीफा दे दिया. इसकी वजह से उनको महाभियोग का सामना नहीं करना पड़ा.

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सौमित्र सेन

उसी साल यानि 2011 को जस्टिस सौमित्र सेन जो कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस रहे हैं, उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था. उन पर अनुचित व्यवहार का आरोप लगा. इसके बाद राज्यसभा में जस्टिस सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया.उन्हें राज्यसभा सांसदों के सामने अपना पक्ष भी रखा था. राज्यसभा से महाभियोग प्रस्ताव पास हो गया.बाद में यह लोकसभा में गया. 5 और 6 सितंबर को इसपर लोकसभा में सुनवाई होनी थी.लेकिन लोकसभा में इस पर वोटिंग होती इससे पहले 1 सितंबर 2011 जस्टिस सेन ने इस्तीफा दे दिया था.

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जे.बी.पार्डीवाला

साल 2015 में जस्टिस जे.बी.पार्डीवाला के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया. पार्डीवाला गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस रह चुके हैं. 2015 में आरक्षण के मुद्दे पर उन्होंने कुछ टिप्पणियां कर दी थी. इसके बाद राज्यसभा के 15 सांसदों ने महाभियोग का नोटिस भेजा. तत्कालीन सभापति हामिद अंसारी कोई फैसला लेते उससे पहले जस्टिस पार्डीवाला ने अपनी टिप्पणी वापस ले ली थी.इसके बाद महाभियोग प्रस्ताव भी वापस ले लिया गया था.

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एस. के.गंगाले

उसी साल यानि 2015 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जज एस.के. गंगाले के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी हुई थी. उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप था. जांच कमिटी की जांच में यह आरोप साबित नहीं हो पाया था.

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नागार्जुन रेड्डी

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाईकोर्ट के जस्टिस नागार्जुन रेड्डी के खिलाफ 2016 और 2017 में दो बार महाभियोग प्रस्ताव लाने की कोशिश की गई थी. लेकिन इन प्रस्तावों पर जरूरी समर्थन नहीं मिल सका था.

Mahabhiyog kya hai – सुप्रीम कोर्ट से जुड़े महाभियोग
20 अप्रैल 2018 को सात पॉलिटिकल पार्टियों के सांसदों ने राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने का पत्र दिया था. लेकिन सभापति ने सांसदों की याचिका को नामंजूर कर दिया.अगर सभापति इस याचिका को मंजूरी देते, तो सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के खिलाफ महाभियोग लाने की यह पहली घटना होती.

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दीपक मिश्रा

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर पाँच आरोप लगाए गए थे.वो कुछ इस प्रकार है-

  • लालू प्रसाद एजुकेशनल ट्रस्ट मामले में संबंधित व्यक्तियों को गैरकानूनी लाभ देना.
  • दूसरा आरोप है प्रसाद ट्रस्ट के मामले में प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया नहीं अपनाई.
  • तीसरा आरोप था की प्रसाद ट्रस्ट मामले में सुनवाई अन्य पीठों को देने की बजाय उन्होंने खुद ही सुनवाई कर ली.
  • चौथा आरोप था की, दीपक मिश्रा ने वकील रहते हुए गलत हलफनामे यानी एफिडेविट से जमीन हासिल कर ली. और 2012 में सुप्रीम कोर्ट का जज बनने के बाद जमीन वापस की. जबकि इसका आवंटन 1985 में ही रद्द किया जा चुका था. यानी इतने वक्त तक उन्होंने अवैध रूप से जमीन को अपने पास रखा था.
  • दीपक मिश्रा पर पांचवा आरोप था की, आम एवं संवेदनशील मामलों को विभिन्न पीठ को आवंटित करने में उन्होंने उनके पद एवं अधिकारों का दुरुपयोग किया.

Mahabhiyog kya hai – महाभियोग का पहिला केस

तो अब बात करते हैं महाभियोग के वर्ल्ड वाइड इतिहास की.तो महाभियोग का इतिहास क्या है
दुनिया की बात करें तो ब्रिटेन से शुरू हुई यह प्रक्रिया हर देश में मौजूद है. लेकिन इसका उपयोग बहुत कम देखने को मिलता है. ऐसा माना जाता है की महाभियोग कानून बनाने की शुरुआत ब्रिटेन में हुयी. ब्रिटेन ने 14 शताब्दी के वक्त महाभियोग का प्रावधान लाया था. इतिहास में महाभियोग चलाने के बहुत सारे उदाहरण मिलते हैं.एक चर्चित मामला है ब्रिटिश संसद में जिसका संबंध इंडिया से है.

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गवर्नर वारेन हेस्टिंग

भारत के पहले गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स पर ब्रिटिश संसद में महाभियोग चलाया गया था.हेस्टिंग ने 20 अक्टूबर 1773 में बंगाल के गवर्नर जनरल पद के तौर पर काम संभाला था. इसी शासनकाल में उनपर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे. लेकिन यह महाभियोग सिद्ध नहीं हो पाया था.

Mahabhiyog kya hai – महाभियोग से जुड़ा अमेरिकी इतिहास

Mahabhiyog kya hai
बिल क्लिंटन

अमेरिका के संविधान के मुताबिक वहां राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति और दूसरे राज्य के पदाधिकारीयोंको महाभियोग के जरिए हटाया जा सकता है.हालांकि अमेरिका के अलग-अलग राज्यों में महाभियोग के स्वरूप और प्रकार में अंतर है.

  • 13 अगस्त 1913 में न्यूयॉर्क के गवर्नर विलियम सुल्ज़र पर महाभियोग लगाकर उनको पद से हटाया गया था.
  • अमेरिका में चार राष्ट्रपतियों के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था.इनमे सन 1933 में जॉन टेलर, सन 1868 में एंड्रू जॉनसन, सन 1974 में रिचर्ड निक्सन और सन 1998 में बिल क्लिंटन शामिल है. लेकिन एंड्रू जॉनसन और बिल क्लिंटन ही ऐसे अमेरिकी पराष्ट्रपति थे जिन्हें अमेरिकी संसद यानि हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव में महाभियोग का सामना करना पड़ा था.
  • इराक युद्ध के लिए तत्कालीन प्रसिडेंट जॉर्ज डब्ल्यू बुश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तयारी थी.
  • बेंघाज़ी हमले के मामले में बराक ओबामा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी थी.
  • फ़िलहाल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ अमेरिकी कांग्रेस सदस्यों ने महाभियोग प्रस्ताव लाने की बात कही है. लेकिन अभी तक लाया नहीं जा सका है.
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