महाशिवरात्री 2019: महाशिवरात्री कब है ? shivratri kab hai ?

shivratri kab hai

महाशिवरात्री कब है ? -shivratri kab hai ?

shivratri kab hai ? यह सवाल अक्सर पूछा जाता है,क्योंकि महाशिवरात्री की कोई तय तारीख नही होती.हर साल महाशिवरात्री अलग अलग तारीख को आती है.इसलिए shivratri kab hai यह सवाल लाजमी है.


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हिंदु धर्म के प्रमुख त्योहारों में से महाशिवरात्री एक है. महाशिवरात्री फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है.साल में आनेवाली 12 शिवरात्रीयो में महाशिवरात्री का विशेष महत्त्व है.पुराणों के अनुसार इसी दिन सृष्टि की उत्पत्ति हुयी थी.भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की शादी भी इसी दिन हुयी थी.

इस साल महाशिवरात्री का त्यौहार 4 मार्च 2019 को सोमवार के दिन है.

महाशिवरात्री का मुहूर्त – shivratri kab hai

शिवरात्री का त्यौहार भारत,नेपाल,बांग्लादेश में खासे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.साथ ही दुनियाभर के हिंदु इस त्यौहार को अपनी अपनी सुविधा के अनुसार मनाते है.शिवरात्री का मुहूर्त अलग अलग देशो के लिए भिन्न होता है.भारत के लिए महाशिवरात्री का शुभ मुहूर्त कुछ इस प्रकार से है.

निशीथ काल पूजा मुहूर्त : 24:08:03 से 24:57:24 तक

अवधि :0 घंटे 49 मिनट

महाशिवरात्री पारणा मुहूर्त :-06:43:48 से 15:29:15


महाशिवरात्री की पौराणिक कथा – shivratri kab hai

shivratri kab hai

पुराने दौर की बात है, एक गाँव में शिकारी रहता था.जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था.शिकारी एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका. क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया.संयोग से उस दिन महाशिवरात्री थी.शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा.चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी.संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की.शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया.

छुटने के बाद अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था.शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा.बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो सुके बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था.शिकारी को उसका पता न चला.पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं.इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए.

एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची.शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची,

मृगी बोली:-

“मैं गर्भिणी हूँ. शीघ्र ही प्रसव करूँगी.तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है.मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना.

शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई. प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए.इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया.कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली.शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा.समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया.तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया.

मृगी बोली:- “हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूँ. कामातुर विरहिणी हूँ.अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ.मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी.तब तुम मेरे प्राण लेना.”

हिरणी की बात सुन शिकारी ने उसे भी जाने दिया.दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका.वह चिंता में पड़ गया.रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था.इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई.शिकार को खोकर उसका माथा ठनका.वह चिंता में पड़ गया रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था.तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि-


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मृगी बोली:- “हे पारधी! इस समय मुझे मत मार.मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी.फिर तुम मुझे मारना.”

शिकारी हँसा और बोला:- “सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं.इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ.मेरे भी बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे.”

मृगी बोली:-“जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी.इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ. हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ.”

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई.उसने उस मृगी को भी जाने दिया.शिकार के अभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था.पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया.शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा.शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग रुक गया.

मृग विनीत स्वर में बोला:-

“हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े, मैं उन मृगियों का पति हूँ.यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो.मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा.”

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया. उसने सारी कथा मृग को सुना दी.शिकारी की बात सुन –

मृग बोला:-“मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं,मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी.अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है,वैसे ही मुझे भी जाने दो.मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ.”

उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था.उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था.धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए.भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया.वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा.

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई.उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई. उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया.देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था.घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की.तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए.

समाप्त

नोट:- हमे उम्मीद है की आपको “shivratri kab hai” का जवाब मिल गया होगा.इस आर्टिकल में लिखी गयी सभी जानकारी को लिखनें मे बेहद सावधानी बरती गयी है.फिर भी किसी भी प्रकार त्रुटि की संभावना से इनकार नही किया जा सकता.इसके लिए आपके सुझाव कमेंट के माध्यम से सादर आमंत्रित हैं.

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